Published on 13 August 2026 | By Ishan Verma, Editor, theexamhub.in
अंतरिक्ष में लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट उपग्रहों की बढ़ती भीड़ और अंतरिक्ष मलबे (Space Debris) के गंभीर खतरों से निपटने की दिशा में ISRO Debris Free Space Mission एक महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी रक्षा कवच बनने जा रहा है। केंद्रीय राज्य मंत्री (PMO और अंतरिक्ष विभाग) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज 13 अगस्त 2026 को राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में जानकारी दी कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अंतरिक्ष पर्यावरण की संवहनीयता सुनिश्चित करने और उपग्रहों के मलबे से हमारे महत्वपूर्ण अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की रक्षा करने के लिए पूरी तरह तत्पर है।
डॉ. सिंह ने बताया कि इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करने वाले ‘सैटेलाइट इंटरनेट’ नेटवर्क के तहत अंतरिक्ष में हजारों उपग्रहों को लॉन्च किया जा रहा है, जिससे अंतरिक्ष की विभिन्न कक्षाओं (Orbital Shells) में आपस में टकराने (Collision Risk) का खतरा कई गुना बढ़ गया है। इसरो का यह महत्वाकांक्षी मिशन ‘सक्रिय मलबा निष्कासन’ (Active Debris Removal – ADR) तकनीकों के माध्यम से अंतरिक्ष में मलबे को नियंत्रित करने का एक ऐतिहासिक रोडमैप है।
| महत्वपूर्ण संकेतक | ISRO Debris Free Space Mission के प्रमुख तथ्य व कड़े आंकड़े |
|---|---|
| मिशन का नाम और नोडल एजेंसी | मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन (Debris Free Space Mission) – इसरो (ISRO) |
| राज्यसभा वक्तव्य की तिथि | 13 अगस्त 2026 (केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा दी गई जानकारी) |
| मुख्य तकनीकी लक्ष्य | सक्रिय मलबा निष्कासन (Active Debris Removal – ADR) और ऑन-ऑर्बिट प्रदर्शन |
| खतरे का मुख्य कारण | लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में हजारों उपग्रहों के मेगा-कॉन्स्टेलेशन (Mega-constellations) |
| संबद्ध अंतरराष्ट्रीय संस्था (IADC) | अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (IADC) – इसरो 1996 से इसका सदस्य है |
| राष्ट्रीय विनियामक संस्था | इन-स्पेस (IN-SPACe) – वर्ष 2024 में ‘पोस्ट-मिशन डिस्पोजल’ के कड़े नियम जारी किए |
| मुख्य सहायक प्रणाली | अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (Space Situational Awareness – SSA) |
| वैश्विक पर्यावरण सहयोग | UN-COPUOS और यूएन वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपसमिति (UN-STSC) |
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ISRO Debris Free Space Mission: अंतरिक्ष मलबे और उपग्रह इंटरनेट के गंभीर खतरे
लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सक्रिय उपग्रहों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होने से अंतरिक्ष की नाजुकता काफी बढ़ गई है, जिससे सुरक्षात्मक प्रणालियों का एकीकरण अत्यंत आवश्यक हो गया है:
- स्वायत्त प्रणालियों की विफलता का जोखिम: हालांकि कई बड़े उपग्रह समूहों (Constellations) के पास टक्कर से बचने के लिए स्वायत्त प्रणालियां (Autonomous Collision Avoidance) होती हैं, लेकिन कई उपग्रह कक्षा में विफल (On-orbit failure) हो जाते हैं। ऐसे निष्क्रिय उपग्रह टकराने से बचने के लिए आवश्यक दिशा बदलने (Manoeuvring) में असमर्थ होते हैं।
- छोटे और अदृश्य मलबे का खतरा: अंतरिक्ष में तैरने वाले अत्यधिक छोटे आकार के मलबे को हमारी रडार प्रणालियां ट्रैक नहीं कर पाती हैं। ऐसे मलबे से बचने या शील्ड लगाने का कोई तरीका नहीं है। यदि ऐसा कोई भी छोटा टुकड़ा किसी सक्रिय उपग्रह से टकराता है, तो वह पूरे मिशन को समाप्त (Mission-ending damage) कर देता है और भारी मात्रा में नया मलबा पैदा करता है।
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मलबामुक्त अंतरिक्ष और सक्रिय मलबा निष्कासन (Active Debris Removal) तकनीक
भारतीय अंतरिक्ष नीति के तहत भारत ने अपने सभी भावी अंतरिक्ष मिशनों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मलबे को कम करने वाले नियमों को अपनाना कानूनी रूप से अनिवार्य किया है:
- एंड-ऑफ-लाइफ डिस्पोजल (End-of-Life Disposal): इसरो का नया मिशन उपग्रहों के काम बंद करने के बाद उन्हें सुरक्षित रूप से कक्षा से हटाने (De-orbiting) की दिशा में एक सक्रिय कदम है। इसके लिए इन-स्पेस (IN-SPACe) ने वर्ष 2024 में नए नियम और प्रक्रियाएं जारी की हैं, जो सभी भारतीय निजी और सरकारी अंतरिक्ष ऑपरेटरों को अपनी संपत्तियों के सुरक्षित अंत (Post-mission Disposal) के लिए उत्तरदायी बनाती हैं।
- सक्रिय मलबा निष्कासन (ADR) प्रदर्शन: इसरो ने पहले ही निष्क्रिय उपग्रहों को खींचकर कक्षा से बाहर लाने वाली ‘सक्रिय मलबा निष्कासन’ (ADR) तकनीक का ऑन-ऑर्बिट प्रदर्शन (On-orbit demonstration) शुरू कर दिया है, जिसे भविष्य में व्यावसायिक रूप से उपयोग किया जाएगा।
- Project NETRA और अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता (SSA): अंतरिक्ष मलबे की वास्तविक समय पर ट्रैकिंग करने और भारतीय उपग्रहों को सुरक्षित रखने के लिए इसरो का ‘प्रोजेक्ट नेत्रा’ (Project NETRA) और ‘अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता’ प्रणाली मुख्य तकनीकी संबल प्रदान करती है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और इसरो (ISRO) की कूटनीतिक भागीदारी
अंतरिक्ष मलबे की समस्या एक वैश्विक संकट है, जिसके समाधान के लिए भारत पिछले तीन दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी भूमिका निभा रहा है:
- IADC में भारत का ऐतिहासिक स्थान: ‘अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति’ (IADC) की स्थापना वर्ष 1993 में की गई थी, जिसे मलबे के नियमन के लिए दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित संस्था माना जाता है। इसरो वर्ष 1996 से ही इसका एक सक्रिय सदस्य है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN-COPUOS) का मंच: भारत संयुक्त राष्ट्र की ‘बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की समिति’ (UN-COPUOS) और इसकी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपसमिति (UN-STSC) के ‘लॉन्ग-टर्म स्पेस सस्टेनेबिलिटी’ (LTS) कार्यसमूह में देश का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ अंतरिक्ष मलबे को कम करने के वैश्विक नियमों को संसोधित किया जाता है।
UPSC Prelims Fact Box: IADC, IN-SPACe & Project NETRA Details
- IADC (Inter-Agency Space Debris Coordination Committee): अंतरिक्ष मलबे के वैज्ञानिक अध्ययन और इसके शमन के उपायों के समन्वय के लिए स्थापित एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सरकारी मंच है, जिसमें नासा (NASA), रोस्कोस्मोस (Roscosmos), ईएसए (ESA) और इसरो (ISRO) जैसी 13 शीर्ष वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियां शामिल हैं।
- इन-स्पेस (IN-SPACe): ‘भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र’ (स्थापना: वर्ष 2020) अंतरिक्ष विभाग के तहत एक एकल-खिड़की स्वायत्त नोडल एजेंसी है, जो देश के गैर-सरकारी निजी उद्यमों (NGPEs) को अंतरिक्ष गतिविधियों के संचालन और विनियामक मंजूरी (जैसे 2024 की डी-ऑर्बिटिंग नीति) देने का कार्य करती है।
- प्रोजेक्ट नेत्रा (Project NETRA): इसरो का एक स्वदेशी ‘नेटवर्क फॉर स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग एंड एनालिसिस’ है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के उपग्रहों को अंतरिक्ष मलबे, उल्कापिंडों और अन्य निष्क्रिय वस्तुओं से सुरक्षित रखने के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) विकसित करना है।
UPSC & State PCS Mains Analysis: अंतरिक्ष स्थिरता (Space Sustainability), केसलर सिंड्रोम और भारत का कूटनीतिक दृष्टिकोण
मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से, ISRO Debris Free Space Mission केवल एक वैज्ञानिक अनुसंधान परियोजना नहीं है, बल्कि यह बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space) के शांतिपूर्ण उपयोग के वैश्विक सिद्धांतों को सुरक्षित रखने और भारत की ‘अंतरिक्ष संप्रभुता’ (Space Sovereignty) को मजबूत करने की दिशा में एक गंभीर विनियामक कदम है।
वर्तमान में स्टारलिंक (Starlink) और वनवेब (OneWeb) जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में हजारों की संख्या में सैटेलाइट मेगा-कॉन्स्टेलेशन लॉन्च किए जा रहे हैं। यह अनियंत्रित विकास अंतरिक्ष के पर्यावरण को ‘ट्रेजेडी ऑफ द कॉमन्स’ (Tragedy of the Commons) की स्थिति में धकेल रहा है, जहाँ मलबे के अनियंत्रित टकराव से ‘केसलर सिंड्रोम’ (Kessler Syndrome) का खतरा उत्पन्न हो गया है। केसलर सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जहाँ अंतरिक्ष मलबे के आपस में टकराने की एक ऐसी अनियंत्रित शृंखला शुरू हो जाती है जो पूरी निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) को आने वाली कई शताब्दियों के लिए उपग्रहों के संचालन के लिए पूरी तरह अनुपयोगी बना देगी।
इस गंभीर खतरे के बीच भारत का ‘मलबामुक्त अंतरिक्ष मिशन’ और सक्रिय मलबा निष्कासन (ADR) तकनीक का विकास करना देश की ‘सॉफ्ट पावर कूटनीति’ (Soft Power Diplomacy) को वैश्विक मंच पर स्थापित करता है। वर्ष 1996 से ही आईएडीसी (IADC) का सक्रिय सदस्य होना और अपने घरेलू निजी ऑपरेटरों (IN-SPACe 2024 गाइडलाइंस के माध्यम से) के लिए डी-ऑर्बिटिंग को अनिवार्य करना यह प्रमाणित करता है कि भारत अंतरराष्ट्रीय नियमों का अक्षरशः पालन करने वाला एक जिम्मेदार और संप्रभु अंतरिक्ष महाशक्ति है। यह सुदृढ़ तकनीकी ढांचा हमारे अरबों रुपये के संचार और मौसम उपग्रहों (INSAT, GSAT) की रक्षा करने के साथ-साथ सतत विकास लक्ष्यों (SDG-9: उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचा) के राष्ट्रीय विज़न को समयबद्ध धरातल पर साकार करने की सबसे मजबूत प्रशासनिक और वैज्ञानिक रीढ़ साबित होगा।
अभ्यास प्रश्न (Practice MCQs)
निम्नलिखित बहुविकल्पीय प्रश्नों के माध्यम से इस महत्वपूर्ण सामरिक और अंतरिक्ष विज्ञान विषय पर अपने ज्ञान का परीक्षण करें:
प्रश्न 1: हाल ही में राज्यसभा में घोषित किए गए ISRO Debris Free Space Mission के संदर्भ में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) किस वर्ष से ‘अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति’ (IADC) का एक सक्रिय सदस्य बना हुआ है?
(A) वर्ष 1993 से
(B) वर्ष 1996 से (Since 1996)
(C) वर्ष 2005 से
(D) वर्ष 2024 से
उत्तर: (B) वर्ष 1996 से (Since 1996)
व्याख्या: ‘अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति’ (IADC) का गठन वर्ष 1993 में किया गया था और भारत का इसरो (ISRO) वर्ष 1996 से ही इस सबसे मान्यता प्राप्त वैश्विक अंतरिक्ष मलबा नियंत्रण संगठन का सक्रिय सदस्य है।
प्रश्न 2: अंतरिक्ष विज्ञान में चर्चित ‘केसलर सिंड्रोम’ (Kessler Syndrome) निम्नलिखित में से किस गंभीर परिस्थिति को परिभाषित करता है?
(A) सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से ओजोन परत के क्षरण की स्थिति।
(B) अंतरिक्ष मलबे के आपस में टकराने की एक ऐसी अनियंत्रित शृंखला, जो लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) को उपग्रहों के संचालन के लिए पूरी तरह अनुपयोगी बना देती है।
(C) उपग्रहों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नलों के आपस में टकराने की समस्या।
(D) गहरे अंतरिक्ष (Deep Space) में ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव का बढ़ना।
उत्तर: (B) अंतरिक्ष मलबे के आपस में टकराने की एक ऐसी अनियंत्रित शृंखला, जो लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) को उपग्रहों के संचालन के लिए पूरी तरह अनुपयोगी बना देती है।
व्याख्या: नासा के वैज्ञानिक डोनाल्ड केसलर द्वारा प्रस्तावित ‘केसलर सिंड्रोम’ वह स्थिति है जिसमें लो अर्थ ऑर्बिट में मलबे के आपस में टकराने की एक ऐसी अनियंत्रित शृंखला (Cascading Collisions) शुरू हो जाती है जो आने वाले समय में उस पूरी कक्षा को उपग्रहों के लिए पूरी तरह असुरक्षित बना देती है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1. ISRO Debris Free Space Mission क्या है और इसके प्राथमिक लक्ष्य क्या हैं?
यह इसरो (ISRO) द्वारा संचालित एक विशेष राष्ट्रीय मिशन है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के अंतरिक्ष अभियानों को पूरी तरह से मलबामुक्त बनाना है। इसके तहत निष्क्रिय हो चुके उपग्रहों के कड़े एंड-ऑफ-लाइफ निपटान (डी-ऑर्बिटिंग) नियमों को लागू करना और सक्रिय मलबा निष्कासन (ADR) तकनीकों का विकास करना शामिल है।
Q2. ‘अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता’ (Space Situational Awareness – SSA) क्या है और इसमें प्रोजेक्ट नेत्रा की क्या भूमिका है?
एसएसए (SSA) का अर्थ अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे सभी कृत्रिम उपग्रहों, मलबे और उल्कापिंडों की वास्तविक समय पर निगरानी करना है। इसरो का स्वदेशी ‘प्रोजेक्ट नेत्रा’ (Project NETRA) इसी एसएसए के तहत काम करने वाली एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली है, जो भारतीय उपग्रहों को मलबे की टक्कर से बचाती है।
Q3. इन-स्पेस (IN-SPACe) द्वारा जारी 2024 के नए विनियामक दिशानिर्देश क्या हैं?
IN-SPACe द्वारा वर्ष 2024 में जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, भारत के सभी गैर-सरकारी निजी और सरकारी अंतरिक्ष ऑपरेटरों के लिए अपने उपग्रहों के सक्रिय कार्यकाल की समाप्ति के बाद उन्हें सुरक्षित रूप से कक्षा से हटाना (Post-mission Disposal) या प्राकृतिक रूप से नष्ट होने के नियमों का पालन करना अनिवार्य किया गया है।
तीन मुख्य निष्कर्ष (3 Key Takeaways)
- मलबामुक्त सुरक्षित बाह्य अंतरिक्ष: ISRO Debris Free Space Mission के तहत भारत अपने सभी भावी अंतरिक्ष अभियानों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मलबे को कम करने वाले कड़े विनियामक नियमों को लागू कर रहा है।
- सक्रिय मलबा निष्कासन (ADR) तकनीक का विकास: निष्क्रिय हो चुके उपग्रहों को कक्षा से खींचकर हटाने वाली एडीआर तकनीक का ऑन-ऑर्बिट प्रदर्शन शुरू कर इसरो ने तकनीकी संप्रभुता प्रदर्शित की है।
- 1996 से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी: इसरो वर्ष 1996 से ही अंतरिक्ष मलबे को कम करने वाली विश्व की सबसे प्रमुख संस्था ‘अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति’ (IADC) का सक्रिय सदस्य है, जो भारत के वैश्विक उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
UPSC Relevance (यूपीएससी प्रासंगिकता)
यह विषय मुख्य रूप से संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के सामान्य अध्ययन पेपर-3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—अंतरिक्ष क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियां, स्वदेशी तकनीक का विकास, प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान, अंतरिक्ष कचरे का प्रबंधन) और सामान्य अध्ययन पेपर-2 (महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थान और उनके नियम) के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण और अनिवार्य समसामयिक मुद्दा है।
Official Source (आधिकारिक स्रोत)
यह लेख भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DoS), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), इन-स्पेस (IN-SPACe), और पत्र सूचना कार्यालय (PIB Delhi) द्वारा 13 अगस्त 2026 को राज्यसभा में पेश की गई आधिकारिक अंतरिक्ष सुरक्षा विवरणी पर आधारित है।