Bastar Dussehra 2026 Conclusion: 75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा का समापन; माता मावली और दंतेश्वरी छत्र को दी विदाई

Bastar Dussehra 2026 Conclusion Bastar Dussehra 2026 Conclusion

रायपुर, 27 अक्टूबर: विश्व के सबसे लंबे समय तक चलने वाले और जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता के प्रतीक 75 दिवसीय ऐतिहासिक बस्तर दशहरा महापर्व का मंगलवार को विधिवत और अत्यंत भावुक वातावरण में समापन हो गया। बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर के राजमहल परिसर स्थित ऐतिहासिक मां दंतेश्वरी मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार और बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार Bastar Dussehra 2026 Conclusion (बस्तर दशहरा 2026 समापन) के तहत माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के पावन छत्र की ससम्मान विदाई संपन्न हुई। छत्तीसगढ़ पुलिस के सशस्त्र जवानों ने माता को गार्ड ऑफ ऑनर (सलामी) दिया, जिसके उपरांत सिर पर मंगल कलश धारण किए सैकड़ों आदिवासी महिलाओं ने पारंपरिक मंगल गीतों के साथ माता को भावभीनी विदाई दी। माता की डोली को कंधों पर उठाकर जिया डेरा होते हुए दंतेवाड़ा के लिए प्रस्थान कराया गया, जिससे समूचा बस्तर संभाग भक्ति और आस्था के रस में सराबोर हो उठा।

मुख्य बिंदु (Key Highlights):

  • ‘Bastar Dussehra 2026 Conclusion’: 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक विश्व प्रसिद्ध महापर्व का हुआ विधिवत समापन।
  • माता मावली और दंतेश्वरी छत्र की विदाई: पारंपरिक रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के साथ दंतेवाड़ा के लिए रवाना हुई डोली।
  • पुलिस बल ने दी सलामी: दंतेश्वरी मंदिर परिसर में सशस्त्र पुलिस जवानों ने माता को दिया गार्ड ऑफ ऑनर।
  • डेढ़ क्विंटल फूलों से सजा विदाई मार्ग: गेंदा, गुलाब और बासंती फूलों की पंखुड़ियों की बारिश के बीच भक्तों ने की पुष्पवर्षा।
  • चांदी जड़ी ऐतिहासिक डोली: बेल और सागौन से निर्मित 20 किलो वजनी डोली में जड़ी है 4 किलो चांदी और 45 चांदी के गुब्बे।
  • शाही व जनजातीय सहभागिता: राजपरिवार के कमलचंद्र भंजदेव, सांसद महेश कश्यप, नीति आयोग उपाध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा रहे उपस्थित।

Bastar Dussehra 2026 Conclusion: राजमहल परिसर में गूंजे जयकारे, पुलिस ने दी सलामी

बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर में आयोजित यह विदाई समारोह बस्तर की अटूट आस्था और लोक-संस्कृति का अद्वितीय दृश्य प्रस्तुत कर रहा था।

Bastar Dussehra 2026 Conclusion के अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर में पुजारियों द्वारा विशेष पूजा-अर्चना और हवन संपन्न कराया गया। धार्मिक विधि-विधान पूर्ण होने के पश्चात जैसे ही माता की डोली मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंची, पुलिस के जवानों ने पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ माता को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। इस भावुक क्षण में पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर मंगल आरती उतारी और बस्तरिया हल्बी व भतरी बोलियों में विदाई गीत गाए, जिससे उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।

डेढ़ क्विंटल फूलों की वर्षा और 4 किलो चांदी से सुसज्जित पावन डोली का वैभव

माता की विदाई यात्रा को ऐतिहासिक और भव्य रूप देने के लिए पूरे मंदिर परिसर और विदाई पथ को भव्य रूप से सजाया गया था:

  • पुष्पवर्षा से महका विदाई मार्ग: दंतेश्वरी मंदिर से लेकर मुख्य सड़क तक लगभग डेढ़ क्विंटल गेंदे, गुलाब और बासंती फूलों की कोमल पंखुड़ियों की चादर बिछाई गई थी। माता के प्रस्थान पर हजारों श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ गुलाब की पंखुड़ियां बरसाईं।
  • कलात्मक डोली की भव्यता: विदाई अनुष्ठान में आकर्षण का केंद्र बेल और सागौन की पवित्र लकड़ी से निर्मित लगभग 15 वर्ष पुरानी डोली रही। लगभग 20 किलोग्राम वजनी इस डोली में 4 किलोग्राम शुद्ध चांदी की नक्काशी, दोनों तरफ चांदी की आकर्षक प्रतिमाएं और 45 चांदी के कलात्मक गुब्बे (झुमके/घंटियां) जड़े हुए हैं।

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कंधों पर डोली उठाकर जिया डेरा पहुंचे राजपरिवार और श्रद्धालु: विदाई भेंट अर्पित

परंपरा के अनुसार माता की डोली को मानव कंधों पर उठाकर ले जाने का विधान श्रद्धापूर्वक निभाया गया:

  • राजपरिवार द्वारा डोली का वहन: बस्तर राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य श्री कमलचंद्र भंजदेव और प्रमुख श्रद्धालुओं ने माता की पावन डोली को अपने कंधों पर उठाकर मंदिर परिसर से जिया डेरा तक पहुंचाया। इसके पश्चात डोली और छत्र को शक्तिपीठ दंतेवाड़ा के लिए विदा किया गया।
  • पारंपरिक विदाई भेंट और महाप्रसाद: विदाई की प्राचीन रस्म के तहत माता को 25 किलो चावल, 11 किलो दाल, शुद्ध देशी घी, पारंपरिक मसाले और पूर्ण सुहाग श्रृंगार सामग्री भेंट स्वरूप अर्पित की गई। मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए 76 किलो बूंदी और लड्डुओं से तैयार 5,000 से अधिक पैकेटों में महाप्रसाद का वितरण किया गया।

बस्तर की सदियों पुरानी समरसता का प्रतीक है दशहरा

विदित हो कि बस्तर दशहरा अन्य स्थानों की तरह रावण दहन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह 75 दिनों तक चलने वाली प्रकृति, शक्ति और विभिन्न जनजातीय समुदायों की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी व माता मावली की आराधना का पर्व है। इसमें बस्तर के सभी 12 जनजातीय समाज, मांझी-चालकी और ग्रामीण एकजुट होकर भाग लेते हैं, जो भारत के सामाजिक सौहार्द की अनुपम मिसाल है।

“बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली जनजातीय संस्कृति, अटूट सामाजिक एकता और मातृशक्ति की आराधना का 75 दिवसीय महापर्व है। माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की यह विदाई हमें अपनी जड़ों, प्रकृति और पूर्वजों के संस्कारों से जोड़े रखने का पावन संदेश देती है। बस्तर की यह समृद्ध आध्यात्मिक विरासत पूरे विश्व के लिए अद्वितीय और वंदनीय है।”— श्री महेश कश्यप, सांसद (बस्तर) एवं अध्यक्ष, बस्तर दशहरा समिति

समापन समारोह में उपस्थित प्रमुख जनप्रतिनिधि, राजपरिवार एवं प्रशासनिक नेतृत्व

जगदलपुर राजमहल परिसर में आयोजित इस पावन विदाई रस्म में शासन, राजपरिवार और बस्तर की पारंपरिक व्यवस्था के प्रमुख प्रतिनिधि उपस्थित रहे:

  • संवैधानिक व राजनीतिक नेतृत्व: राज्य नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री गणेश शंकर मिश्रा, बस्तर लोकसभा सांसद एवं दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप, बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष श्री बलराम मांझी।
  • राजपरिवार प्रतिनिधि: बस्तर राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचंद्र भंजदेव।
  • पारंपरिक जनजातीय प्रमुख: बस्तर के सभी परगनाओं से पधारे मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरीन, नाईक-पाईक, कोटवार एवं देव प्रतिनिधि।
  • प्रशासनिक अमला: बस्तर संभागायुक्त श्री डोमन सिंह, जिला प्रशासन एवं पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुजन।

ऐतिहासिक बस्तर दशहरा 2026 समापन: एक नजर में

  • पर्व का नाम: ऐतिहासिक बस्तर दशहरा महापर्व (75 दिवसीय अनुष्ठान)
  • समापन अनुष्ठान: माता मावली डोली एवं मां दंतेश्वरी छत्र विदाई रस्म
  • स्थल व तिथि: राजमहल परिसर, दंतेश्वरी मंदिर, जगदलपुर (27 अक्टूबर 2026)
  • डोली की विशेषता: बेल व सागौन की लकड़ी, 20 किग्रा वजन, 4 किलो चांदी व 45 चांदी के गुब्बे
  • पुष्प सज्जा: 1.5 क्विंटल गेंदा व गुलाब की पंखुड़ियों से विदाई मार्ग की सजावट
  • विदाई भेंट: 25 किलो चावल, 11 किलो दाल, शुद्ध घी, मसाले व श्रृंगार सामग्री
  • प्रसाद वितरण: 76 किलो बूंदी-लड्डू से बने 5,000+ पैकेट
  • डोली वाहक: बस्तर राजपरिवार के कमलचंद्र भंजदेव एवं श्रद्धालु (जिया डेरा तक)
  • प्रमुख उपस्थिति: गणेश शंकर मिश्रा, सांसद महेश कश्यप, बलराम मांझी, कमिश्नर डोमन सिंह

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Bastar Dussehra 2026 Conclusion की मुख्य विदाई रस्म क्या है?

Bastar Dussehra 2026 Conclusion के तहत 75 दिवसीय अनुष्ठान के अंतिम दिन जगदलपुर राजमहल स्थित दंतेश्वरी मंदिर से माता मावली की डोली और दंतेश्वरी माई के छत्र को सशस्त्र सलामी और कलश यात्रा के साथ दंतेवाड़ा के लिए विदा किया गया।

माता मावली की पावन डोली की क्या विशेषताएं हैं?

माता मावली की 15 वर्ष पुरानी डोली बेल और सागौन की लकड़ी से निर्मित है, जिसका वजन करीब 20 किलो है। इसमें लगभग 4 किलो चांदी, दोनों तरफ चांदी की प्रतिमाएं और 45 चांदी के गुब्बे जड़े हुए हैं।

विदाई के समय माता को क्या भेंट और प्रसाद अर्पित किया गया?

माता को विदाई स्वरूप 25 किलो चावल, 11 किलो दाल, शुद्ध घी, मसाले और श्रृंगार सामग्री भेंट की गई, जबकि श्रद्धालुओं को 76 किलो बूंदी-लड्डू से तैयार 5,000 से अधिक पैकेटों में महाप्रसाद बांटा गया।

बस्तर दशहरा सामान्य दशहरे से किस प्रकार भिन्न और ऐतिहासिक है?

बस्तर दशहरा में रावण दहन नहीं होता; यह 75 दिनों तक चलने वाला आदि शक्ति मां दंतेश्वरी और प्रकृति की आराधना का महापर्व है, जिसमें समस्त आदिवासी समाज की सहभागिता होती है।

आधिकारिक स्रोत: बस्तर दशहरा समिति / जिला जनसंपर्क कार्यालय (PRO), जगदलपुर (बस्तर) / जनसंपर्क संचालनालय (DPR Raipur)

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