Chhattisgarh Shaktipeeth Project: 1000 किमी लंबे कॉरिडोर से जुड़ेंगे 5 प्रमुख मंदिर; चार धाम की तर्ज पर संवरेंगे शक्तिपीठ

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रायपुर, 15 अक्टूबर: प्राकृतिक सौंदर्य, घने वनों, जलप्रपातों और समृद्ध जनजातीय संस्कृति से संपन्न छत्तीसगढ़ अब देश और दुनिया के नक्शे पर एक प्रमुख आध्यात्मिक एवं धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर रहा है। उत्तराखंड के विश्वविख्यात ‘चार धाम’ तीर्थ यात्रा मॉडल की तर्ज पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने Chhattisgarh Shaktipeeth Project (छत्तीसगढ़ शक्तिपीठ परियोजना) की शुरुआत की है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत राज्य के पांच प्रमुख शक्तिपीठों को आपस में जोड़ते हुए लगभग 1,000 किलोमीटर लंबा आध्यात्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जा रहा है। प्रदेश के बजट 2026-27 में ‘छत्तीसगढ़ आस्था पथ (शक्तिपीठ भ्रमण) योजना’ के लिए ₹5 करोड़ का विशेष प्रावधान किया गया है, जिसके जरिए श्रद्धालुओं को सुगम पहुंच मार्ग, उच्चस्तरीय सुविधाएं और सुरक्षित तीर्थाटन उपलब्ध कराया जाएगा।

मुख्य बिंदु (Key Highlights):

  • ‘Chhattisgarh Shaktipeeth Project’: उत्तराखंड के चार धाम की तर्ज पर 1,000 किमी लंबे धार्मिक कॉरिडोर का हो रहा है निर्माण।
  • 5 प्रमुख शक्तिपीठ सर्किट: डोंगरगढ़ (मां बम्लेश्वरी), रतनपुर (मां महामाया), दंतेवाड़ा (मां दंतेश्वरी), कुदरगढ़ (मां बागेश्वरी) और चंद्रपुर (मां चंद्रहासिनी)।
  • छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना: वर्ष 2026-27 के बजट में पांचों शक्तिपीठों के भ्रमण और दर्शन हेतु ₹5 करोड़ का बजटीय प्रावधान।
  • रतनपुर के लिए ₹200 करोड़ की कार्ययोजना: केंद्र सरकार की ‘प्रसाद’ (PRASHAD) योजना के तहत महामाया मंदिर के समग्र विकास का प्रस्ताव प्रेषित।
  • विश्वस्तरीय तीर्थ अधोसंरचना: रोप-वे, विश्राम गृह, 24 घंटे सुरक्षा, सीसीटीवी, डिजिटल सूचना स्क्रीन और स्थानीय वास्तुकला का संरक्षण।
  • राज्य का पर्यटन आधार: 138 स्थल प्राथमिकता सूची में, 58 संरक्षित स्मारक, 11 वन्यजीव अभयारण्य और 3 राष्ट्रीय उद्यान शामिल।

Chhattisgarh Shaktipeeth Project: 1,000 किमी का आध्यात्मिक गलियारा

छत्तीसगढ़ में लगभग 138 स्थलों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय महत्व के पर्यटन स्थल के रूप में चिन्हित किया गया है, जिसमें 58 प्राचीन स्मारक, 11 अभयारण्य और 3 राष्ट्रीय उद्यान संरक्षित हैं। भारतीय परंपरा में ‘अतिथि देवो भवः’ के भाव को आत्मसात करते हुए अब धार्मिक पर्यटन को राज्य के आर्थिक विकास का इंजन बनाया जा रहा है।

Chhattisgarh Shaktipeeth Project के माध्यम से राज्य सरकार पांचों प्रमुख शक्तिपीठों को चौड़ी सड़कों, नियमित परिवहन, पर्यटक सहायता केंद्रों और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ रही है। इन स्थलों पर श्रद्धालुओं के लिए स्वच्छ पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, आधुनिक सामुदायिक शौचालय, सुव्यवस्थित पार्किंग, प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षा का कड़ा पहरा तैयार किया जा रहा है, ताकि देश-विदेश के तीर्थयात्री बिना किसी असुविधा के दर्शन कर सकें।

रतनपुर महामाया मंदिर के लिए ₹200 करोड़: केंद्र की ‘प्रसाद’ योजना में शामिल

केंद्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा संचालित ‘प्रसाद’ (PRASHAD – तीर्थयात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक संवर्धन अभियान) योजना के प्रथम चरण में देश के 26 प्रमुख तीर्थ स्थलों का चयन किया गया है:

  • रतनपुर हेतु ₹200 करोड़ का प्रस्ताव: बिलासपुर जिले के रतनपुर स्थित ऐतिहासिक मां महामाया मंदिर के समग्र कायाकल्प, सौंदर्यीकरण और यात्री सुविधाओं के विस्तार के लिए ₹200 करोड़ की विस्तृत कार्ययोजना (DPR) केंद्र सरकार को भेजी गई है, जिसे स्वीकृति मिलते ही निर्माण एजेंसी तय कर काम शुरू होगा।
  • अन्य 4 शक्तिपीठों की डीपीआर: डोंगरगढ़, कुदरगढ़, चंद्रपुर और दंतेवाड़ा के लिए भी कॉम्प्रिहेंसिव प्रोजेक्ट रिपोर्ट (CPR) तैयार करने की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। दंतेश्वरी मंदिर को भी प्रसाद योजना में शामिल कराने का प्रस्ताव केंद्र को प्रेषित है।

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परियोजना के तहत विकसित होने वाली आधुनिक नागरिक व धार्मिक सुविधाएं

पांचों शक्तिपीठों के नैसर्गिक परिवेश और स्थानीय वास्तुकला को सुरक्षित रखते हुए निम्नलिखित अधोसंरचना विकसित की जा रही है:

  • दर्शन व पूजन व्यवस्था: व्यवस्थित हवन-पूजन स्थल, स्टील रेलिंग वाली कतार व्यवस्था, छायादार शेड और श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था।
  • आधुनिक कनेक्टिविटी व मोबिलिटी: पहाड़ी मंदिरों पर सुगम रोप-वे (Ropeway) का निर्माण व विस्तार, चौड़ी पहुंच सड़कें और सुव्यवस्थित पार्किंग।
  • सुरक्षा व डिजिटल सहायता: पूरे मंदिर परिसर में 24 घंटे सुरक्षा गार्ड, सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और डिजिटल सूचना स्क्रीन (Digital Display Screens)।
  • ठहराव व आतिथ्य: पर्यटन मंडल के सूचना केंद्र, सर्वसुविधायुक्त धर्मशालाएं और ग्रामीणों द्वारा संचालित पारंपरिक होमस्टे (Homestays)।

परियोजना में शामिल 5 प्रमुख शक्तिपीठों का गौरवशाली इतिहास एवं पौराणिक मान्यताएं

1. मां बम्लेश्वरी मंदिर, डोंगरगढ़ (जिला राजनांदगांव)

डोंगरगढ़ की सुरम्य पहाड़ियों पर समुद्र तल से लगभग 1600 फीट की ऊंचाई पर स्थित मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

  • 2200 से 2500 वर्ष प्राचीन इतिहास: प्राचीन काल में यह क्षेत्र ‘कामाख्या नगरी’ कहलाता था, जहां प्रतापी राजा वीरसेन का शासन था। निःसंतान राजा ने शिव और दुर्गा की कठिन तपस्या की, जिसके फलस्वरूप पुत्र रत्न (मदनसेन) की प्राप्ति के बाद उन्होंने इस सिद्ध पीठ की स्थापना करवाई थी।
  • ऐतिहासिक विस्तार: 11वीं शताब्दी में कलचुरी राजा कर्णदेव ने मंदिर का पुनर्विकास किया, और 15वीं-16वीं शताब्दी में गोंड राजाओं ने इसका विस्तार किया। केंद्र सरकार ने यहाँ प्रसाद योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं की घोषणा की है।

2. मां महामाया मंदिर, रतनपुर (जिला बिलासपुर)

बिलासपुर-कोरबा मार्ग पर स्थित रतनपुर का महामाया मंदिर कलचुरी नरेशों की राजधानी और कुलदेवी का ऐतिहासिक सिद्ध शक्तिपीठ है।

  • 1050 ईस्वी का निर्माण: इस भव्य मंदिर का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी (लगभग 1050 ईस्वी) में कलचुरी वंश के राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा कराया गया था। बाद में वर्ष 1492 ईस्वी (विक्रम संवत 1552) में राजा बहार साईं ने वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
  • अद्भुत दोहरी प्रतिमा और मान्यता: गर्भगृह में मां महामाया की दुर्लभ दोहरी (Dual) प्रतिमा स्थापित है—सामने महिषासुरमर्दिनी और उनके पीछे मां सरस्वती विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहाँ माता सती का दाहिना स्कंध (कंधा) या दाहिना हाथ गिरा था।

3. मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा (दक्षिण बस्तर)

शंखिनी और डंकिनी नदियों के पावन संगम तट पर स्थित मां दंतेश्वरी का मंदिर जनजातीय संस्कृति और सनातन आस्था के मिलन का सर्वोच्च प्रतीक है।

  • सती के दाँत गिरने की पौराणिक मान्यता: 52 शक्तिपीठों में से एक इस पावन भूमि पर माता सती के दाँत गिरे थे, जिससे इसका नाम ‘दंतेवाड़ा’ और देवी का नाम ‘दंतेश्वरी’ पड़ा।
  • काकतीय वंश की कुलदेवी: 14वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर की अधिष्ठात्री छह भुजाओं वाली काले पत्थर की महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा है, जिन्हें बस्तर के काकतीय राजा अपनी कुलदेवी मानते थे। विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा के दौरान माता की डोली और छत्र को पदयात्रा करते हुए जगदलपुर लाया जाता है, जो बस्तर की सांस्कृतिक एकता की रीढ़ है।

4. मां बागेश्वरी कुदरगढ़ धाम (जिला सूरजपुर)

सूरजपुर जिले के ओडगी विकासखंड में 1500 फीट ऊंचे पहाड़ पर घने जंगलों से घिरा यह धाम शक्ति और साहस का दिव्य केंद्र है।

  • माता पार्वती की तपोस्थली: मान्यता है कि यहाँ मां भगवती ने तपस्या कर राक्षसों का संहार किया था। लगभग 400 वर्ष पूर्व बालंद राजा ने माता बागेश्वरी की प्रतिमा स्थापित की थी। बाद में चौहान वंश के राजाओं ने बालंद को पराजित कर मंदिर की देखरेख संभाली।
  • चौहान और बैगा परंपरा: आज भी नवरात्र में सुबह की पहली आरती चौहान वंश के वंशज करते हैं। 18वीं सदी में चौहान राजाओं ने पूजा-अर्चना का दायित्व मूल आदिवासी ‘बैगा जनजाति’ को सौंपा था, और तब से आज तक बैगा समुदाय के पुजारी ही माता की मुख्य पूजा करते हैं।

5. मां चंद्रहासिनी मंदिर, चंद्रपुर (जिला सक्ती)

महानदी और मांड नदी के पवित्र संगम पर स्थित मां चंद्रहासिनी का मंदिर प्राचीन काल से तांत्रिक और सात्विक आस्था का सिद्ध केंद्र है।

  • संबलपुर के राजा चंद्रहास का इतिहास: संबलपुर के राजा चंद्रहास ने इस मंदिर की स्थापना की थी, जिसके कारण देवी का नाम ‘चंद्रहासिनी’ और नगर का नाम ‘चंद्रपुर’ पड़ा। वर्ष 1522 में गोंड राजा धुंध्या राम साह अत्राम ने मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया और देवी को कुलदेवी माना।
  • बायां कान और 1935 की बाढ़ की कथा: मान्यता है कि यहाँ सती का बायां कान गिरा था। वर्ष 1935 में महानदी में भीषण बाढ़ के समय राजा के वंशज ठाकुर शशिभूषण द्वारा प्रार्थना करने पर नदी का जलस्तर चमत्कारिक रूप से घट गया था। नदी तट पर आज भी माता के पाषाण पद-चिह्न पूजे जाते हैं।

पर्यटन को उद्योग का दर्जा: स्थानीय आजीविका और सांस्कृतिक संरक्षण

राज्य सरकार ने नई औद्योगिक नीति के तहत पर्यटन को ‘उद्योग’ का दर्जा दिया है, जिससे निजी निवेशकों, स्थानीय युवाओं और होमस्टे संचालकों को सब्सिडी और रियायतें मिल रही हैं।

शक्तिपीठ कॉरिडोर बनने से टाइम-शेयरिंग, ईको-टूरिज्म और धार्मिक पर्यटन का ऐसा चक्र विकसित होगा, जिससे स्थानीय आदिवासी शिल्पकारों (ढोकरा, कोसा, काष्ठकला), पूजा सामग्री विक्रेताओं, होटल-ढाबा संचालकों और वाहन चालकों को सालभर नियमित रोजगार मिलेगा तथा स्थानीय समुदायों के बौद्धिक और सांस्कृतिक अधिकारों का संरक्षण होगा।

“छत्तीसगढ़ की माटी में आध्यात्मिक ऊर्जा और देवियों की असीम कृपा है। ‘शक्तिपीठ परियोजना’ केवल सड़कों और कंक्रीट का निर्माण नहीं है, बल्कि यह हमारी 2500 साल पुरानी आस्था, इतिहास और जनजातीय परंपराओं को सहेजने का महायज्ञ है। 1,000 किलोमीटर का यह कॉरिडोर हमारे पांचों शक्तिपीठों को विश्वस्तरीय पहचान दिलाएगा और स्थानीय युवाओं के लिए स्वावलंबन के नए द्वार खोलेगा।”— धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक, जनसंपर्क, छत्तीसगढ़ शासन

छत्तीसगढ़ शक्तिपीठ परियोजना: एक नजर में

  • परियोजना का नाम: Chhattisgarh Shaktipeeth Project (छत्तीसगढ़ शक्तिपीठ परियोजना)
  • कॉरिडोर की लंबाई: लगभग 1,000 किलोमीटर लंबा धार्मिक पर्यटन सर्किट
  • मॉडल आधार: उत्तराखंड की ‘चार धाम’ यात्रा की तर्ज पर विकास
  • राज्य बजटीय प्रावधान: ₹5 करोड़ (‘छत्तीसगढ़ आस्था पथ योजना’ FY 2026-27)
  • केंद्रीय ‘प्रसाद’ योजना प्रस्ताव: ₹200 करोड़ (मां महामाया मंदिर, रतनपुर समग्र विकास)
  • शामिल 5 शक्तिपीठ: डोंगरगढ़ (राजनांदगांव), रतनपुर (बिलासपुर), दंतेवाड़ा (दक्षिण बस्तर), कुदरगढ़ (सूरजपुर) और चंद्रपुर (सक्ती)
  • प्रमुख नदियां/संगम: शंखिनी-डंकिनी (दंतेवाड़ा), महानदी-मांड (चंद्रपुर)
  • प्रमुख जनजातीय व पारंपरिक सहभागिता: बस्तर दशहरा (दंतेश्वरी), बैगा पुजारी परंपरा (कुदरगढ़)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Chhattisgarh Shaktipeeth Project क्या है और इसमें कितने मंदिर शामिल हैं?

Chhattisgarh Shaktipeeth Project उत्तराखंड के चार धाम की तर्ज पर राज्य के 5 प्रमुख शक्तिपीठों (डोंगरगढ़, रतनपुर, दंतेवाड़ा, कुदरगढ़ और चंद्रपुर) को जोड़ने वाला लगभग 1,000 किलोमीटर लंबा आध्यात्मिक पर्यटन कॉरिडोर है।

इस परियोजना के लिए राज्य सरकार ने बजट में कितना प्रावधान किया है?

राज्य सरकार ने ‘छत्तीसगढ़ आस्था पथ (शक्तिपीठ भ्रमण) योजना’ के अंतर्गत पांचों शक्तिपीठों के विकास और दर्शन व्यवस्था के लिए बजट 2026-27 में ₹5 करोड़ का प्रावधान किया है।

रतनपुर महामाया मंदिर के लिए केंद्र सरकार की किस योजना में प्रस्ताव भेजा गया है?

रतनपुर स्थित मां महामाया मंदिर के समग्र कायाकल्प के लिए केंद्र सरकार की ‘प्रसाद’ (PRASHAD) योजना के तहत ₹200 करोड़ की विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर पर्यटन मंत्रालय को भेजी गई है।

कुदरगढ़ धाम में पूजा-अर्चना की क्या ऐतिहासिक परंपरा रही है?

सूरजपुर के कुदरगढ़ में 18वीं सदी में चौहान राजाओं द्वारा पूजा की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद से आज तक मूल आदिवासी ‘बैगा जनजाति’ के पुजारी ही माता बागेश्वरी की मुख्य पूजा संपन्न कराते हैं।

आधिकारिक आलेख एवं स्रोत: श्री धनंजय राठौर (संयुक्त संचालक, जनसंपर्क, रायपुर) / पर्यटन एवं संस्कृति विभाग (DPR Raipur), छत्तीसगढ़ शासन

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