Droupadi Murmu Muria Darbar: ‘मैं भी एक मांझी की बेटी हूँ’; राष्ट्रपति ने बस्तर में सराहा आदिवासियों का पारंपरिक सुशासन

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जगदलपुर, 23 अक्टूबर: बस्तर के 75 दिनों तक चलने वाले विश्वप्रसिद्ध दशहरा महापर्व की सदियों पुरानी लोकतांत्रिक परंपरा ‘मुरिया दरबार’ आज उस समय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज हो गई, जब देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने स्वयं इस पारंपरिक सभा की मुख्य आसंदी से आदिवासी समाज को संबोधित किया। Droupadi Murmu Muria Darbar (द्रौपदी मुर्मु मुरिया दरबार) में बस्तर संभाग के सैकड़ों पारंपरिक मांझी, चालकी, मेंबर-मेंबरिन और नाइक-पाइक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने एक अत्यंत भावुक उद्गार व्यक्त किया। उन्होंने कहा—“मैं भी इसी आदिवासी संस्कृति से आती हूँ। मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे। मैं एक मांझी की बेटी हूँ, गांव के मुखिया की बेटी हूँ।” उन्होंने बस्तर की सदियों पुरानी सामूहिक निर्णय प्रणाली, अलिखित संविधान और आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की परंपरा को न्याय और सुशासन का दुनिया में सबसे उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

मुख्य बिंदु (Key Highlights):

  • ‘Droupadi Murmu Muria Darbar’: बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल होने वाली देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मु।
  • भावुक संबोधन ‘मैं मांझी की बेटी हूँ’: राष्ट्रपति ने अपने पारिवारिक मांझी (मुखिया) पृष्ठभूमि का उल्लेख कर बस्तरवासियों से जोड़ा आत्मीय नाता।
  • आदिवासी समाज का अलिखित संविधान: राजाओं और अंग्रेजों के दौर से लेकर आज तक पीढ़ियों से जीवित है जनजातीय पारंपरिक न्याय व्यवस्था।
  • अदालतों के 30 साल लंबे मुकदमों से बेहतर पारंपरिक न्याय: 50-52 गांवों की ‘पीड़-परगना’ व्यवस्था में 7-8 दिन बैठकर आपसी सहमति से हल होते थे विवाद।
  • शिक्षा और संस्कृति का संतुलन: बच्चों को आधुनिक उच्च शिक्षा दिलाएं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों, बोली और रीति-रिवाजों को कभी न छोड़ें।
  • नक्सलवाद के खिलाफ एकजुटता का आह्वान: समाज की आंतरिक एकता ही हिंसा और भटकाव की चुनौतियों का स्थायी समाधान है।

Droupadi Murmu Muria Darbar: ‘मैं भी एक मांझी की बेटी हूँ’, बस्तर से जोड़ा आत्मीय नाता

जगदलपुर के ऐतिहासिक दरबार में जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पारंपरिक आदिवासी पगड़ी और वेशभूषा में सजे मांझी-चालकियों को देखा, तो वे अपनी पुरानी स्मृतियों से अभिभूत हो गईं।

Droupadi Murmu Muria Darbar के मंच से उन्होंने कहा कि बस्तर आकर उन्हें अपने घर-आंगन का अहसास हो रहा है। उन्होंने कहा कि उनके परिवार के बुजुर्ग आज भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मांझी परिवार में जन्म लेने के कारण वे ग्राम प्रमुख के दायित्व, सामुदायिक उत्तरदायित्व और परंपराओं के मूल्य को भली-भांति समझती हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ राजशाही गई, अंग्रेजी हुकूमत बीती और आधुनिक लोकतंत्र आया, लेकिन आदिवासी समाज की जो आंतरिक स्वशासन प्रणाली है, वह आज भी उतनी ही जीवंत और प्रासंगिक है।

पारंपरिक न्याय बनाम अदालती मुकदमे: 50-52 गांवों की ‘पीड़ व्यवस्था’ की सीख

राष्ट्रपति ने आधुनिक न्याय प्रणाली और आदिवासी पारंपरिक न्याय व्यवस्था की तुलना करते हुए एक बेहद व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत किया:

  • अदालतों में 20-30 साल का भटकाव: उन्होंने कहा कि आज के समय में विवाद होने पर लोग पुलिस और अदालतों के चक्कर काटते हैं, जहाँ न्याय पाने में 10, 20 या 30 वर्ष लग जाते हैं और परिवार का समय व गाढ़ी कमाई बर्बाद हो जाती है।
  • पीड़-परगना का सामूहिक मंथन: इसके विपरीत, आदिवासी परंपरा में 50 से 52 गांवों को मिलाकर एक ‘पीड़’ (Pīṛ) और ‘परगना’ होता था। जब कोई पारिवारिक या जमीनी विवाद आता, तो मांझी और बुजुर्ग बैठकर लगातार 7 से 8 दिनों तक संवाद करते थे और जब तक दोनों पक्षों की सहमति से समाधान नहीं निकलता, तब तक बैठक जारी रहती थी। यह व्यवस्था समाज में प्रेम और भाईचारा बनाए रखती है।

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‘बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाएं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान न खोएं’

बदलते दौर में आदिवासी युवाओं के भविष्य पर बात करते हुए राष्ट्रपति ने शिक्षा और संस्कृति के समन्वय पर विशेष जोर दिया:

  • विकास और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक: राष्ट्रपति ने कहा कि हमें नई सोच और आधुनिक तकनीकों को अपनाना होगा। बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और प्रशासनिक अधिकारी बनाएं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा, देवगुड़ी, घोटुल और पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं से नाता तोड़ लें।
  • सरकारी संरक्षण पर निर्भर न रहें: उन्होंने कहा कि हमारी परंपराओं का उल्लेख सरकारी गजट या कानूनों में हो या न हो, समाज का यह दायित्व है कि वह अपने अलिखित संविधान और सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण पहुंचाए।

नक्सलवाद के विरुद्ध सामाजिक एकजुटता का आह्वान

बस्तर में दशकों तक चले नक्सली संत्रास का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि समाज जब एकजुट होता है, तो बड़ी से बड़ी विपत्ति टल जाती है:

उन्होंने कहा कि शांति और विश्वास ही प्रगति का आधार हैं। बस्तर के युवाओं को बंदूक और हिंसा के भटकाव से निकालकर शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा में लाने के लिए पूरे आदिवासी समाज को एक दीवार बनकर खड़े होना होगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि केंद्र और राज्य सरकार आदिवासी क्षेत्रों के विकास और अधिकारों के संरक्षण के लिए पूरी निष्ठा से कार्य कर रही है।

पारंपरिक मांझी-चालकी और राजपरिवार ने जताया राष्ट्रपति का आभार

समारोह में बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष व बस्तर सांसद श्री महेश कश्यप, उपाध्यक्ष श्री बलराम मांझी, फरसपाल के मांझी श्री अर्जुन मांझी, हमीरगढ़ के मांझी श्री शशिभूषण मांझी और किलेपाल के श्री गंगाधर मांझी ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने राष्ट्रपति का पारंपरिक पगड़ी और स्मृति चिह्न भेंटकर आभार जताया कि उन्होंने दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में दिए गए निमंत्रण का मान रखते हुए बस्तर के आदिवासियों के बीच आकर उनकी मान-प्रतिष्ठा को पूरे विश्व में बढ़ाया।

“समय के साथ कानून और सरकारें बदलती हैं, लेकिन आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था आज भी जीवित है। यह किसी किताब में नहीं लिखी गई, लेकिन समाज इसे पीढ़ियों से दिल से निभा रहा है। मैं भी एक मांझी की बेटी हूँ और मुझे अपनी जड़ों पर गर्व है। आधुनिक अदालतों के 30 साल लंबे मुकदमों के बजाय जब मांझी बैठकर 7 दिन में भाईचारे से फैसला करते हैं, तो वही सच्चा सुशासन है। अपने बच्चों को खूब पढ़ाइए, लेकिन अपनी माटी और संस्कृति को कभी मत भूलिए।”— श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, राष्ट्रपति, भारत गणराज्य (मुरिया दरबार, जगदलपुर संबोधन)

मुरिया दरबार में उपस्थित शीर्ष मंत्रिमंडल एवं पारंपरिक नेतृत्व

सिरहासार भवन में आयोजित इस ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राज्य शासन और बस्तर के पारंपरिक प्रशासनिक तंत्र की अभूतपूर्व उपस्थिति रही:

  • संवैधानिक व राजकीय नेतृत्व: राज्यपाल श्री रमेन डेका, मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री राजेश अग्रवाल, वन मंत्री श्री केदार कश्यप।
  • जनप्रतिनिधि व राजपरिवार: बस्तर राजपरिवार के सदस्य श्री कमलचन्द्र भंजदेव, सांसद श्री महेश कश्यप, कांकेर सांसद श्री भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, महापौर श्री संजय पाण्डे।
  • पारंपरिक जनजातीय संस्थाएं: बस्तर के सभी परगनाओं से पधारे मांझी, चालकी, मेंबर-मेंबरिन, नाइक, पाइक एवं बस्तर दशहरा समिति के सदस्यगण।
  • प्रशासनिक अधिकारी: मुख्यमंत्री के सचिव श्री राहुल भगत, कमिश्नर श्री डोमन सिंह, आईजी श्री बी.एन. मीणा, कलेक्टर श्री आकाश छिकारा, एसपी श्री शलभ सिन्हा।

बस्तर दशहरा मुरिया दरबार 2026: एक नजर में

  • आयोजन: ऐतिहासिक मुरिया दरबार (Muria Darbar – Bastar Dussehra)
  • मुख्य अतिथि: महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु (President of India)
  • स्थल व तिथि: सिरहासार भवन परिसर, जगदलपुर, बस्तर (23 अक्टूबर 2026)
  • विशिष्ट अतिथि: राज्यपाल रमेन डेका एवं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय
  • ऐतिहासिक परंपरा: काकतीय राजवंश काल से चली आ रही प्रत्यक्ष जनजातीय संसद
  • राष्ट्रपति का व्यक्तिगत उद्गार: “मैं भी एक मांझी (ग्राम मुखिया) की बेटी हूँ”
  • पारंपरिक न्याय व्यवस्था: पीड़ (50-52 गांव) और परगना स्तर पर आपसी सहमति से विवाद निपटारा
  • पारंपरिक नेतृत्व सहभागिता: अर्जुन मांझी (फरसपाल), शशिभूषण मांझी (हमीरगढ़), गंगाधर मांझी (किलेपाल), बलराम मांझी

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Droupadi Murmu Muria Darbar में राष्ट्रपति ने अपने पारिवारिक संबंध के बारे में क्या कहा?

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने भावुक होते हुए कहा, “मैं भी एक मांझी की बेटी हूँ, गांव के मुखिया की बेटी हूँ। मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे।”

बस्तर दशहरा का ‘मुरिया दरबार’ क्या है और इसका क्या महत्व है?

मुरिया दरबार बस्तर की सदियों पुरानी पारंपरिक जनजातीय संसद है, जहाँ राजा/शासक और बस्तर के पारंपरिक मांझी-चालकी आमने-सामने बैठकर वनांचल की समस्याओं का आपसी सहमति से समाधान करते हैं।

राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था की तुलना आधुनिक अदालतों से कैसे की?

उन्होंने कहा कि आधुनिक अदालतों में मुकदमों में 20-30 साल लग जाते हैं और पैसा बर्बाद होता है, जबकि आदिवासी समाज में 50-52 गांवों की ‘पीड़’ व्यवस्था में बैठकर 7-8 दिनों में आपसी भाईचारे से विवाद सुलझा लिए जाते हैं।

मुरिया दरबार में बस्तर के किन पारंपरिक मांझियों ने विचार रखे?

समारोह में बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी, फरसपाल के अर्जुन मांझी, हमीरगढ़ के शशिभूषण मांझी और किलेपाल के गंगाधर मांझी ने विचार रखकर राष्ट्रपति का आभार व्यक्त किया।

आधिकारिक स्रोत: राष्ट्रपति सचिवालय / बस्तर दशहरा समिति / जिला प्रशासन बस्तर / जनसंपर्क संचालनालय (DPR Raipur), छत्तीसगढ़ शासन

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