खैरागढ़, 14 अक्टूबर: एशिया के प्रथम और भारत के सबसे प्रतिष्ठित संगीत एवं ललित कला तीर्थ Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya (खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय) का 70वां स्थापना दिवस समारोह गरिमामय और सांस्कृतिक उल्लास के वातावरण में संपन्न हुआ। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के दरबार हॉल में आयोजित मुख्य समारोह को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका ने विद्यार्थियों और प्राध्यापकों से आह्वान किया कि वे छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककलाओं को केवल मंचों तक सीमित न रखें, बल्कि डिजिटल मीडिया, इंटरनेट और स्मार्टफोन के माध्यम से इसे वैश्विक पटल पर पहुंचाएं। इस अवसर पर राज्यपाल ने दानवीर राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती द्वारा अपनी पुत्री राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में अपना पूरा राजमहल दान करने के अप्रतिम त्याग को याद करते हुए 70 वर्षों की गौरवमयी यात्रा को शिक्षकों और विद्यार्थियों की साझी साधना का परिणाम बताया।
मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- ‘Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya’: राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका के मुख्य आतिथ्य में संपन्न हुआ 70वां स्थापना दिवस।
- लोककलाओं का डिजिटल विस्तार: पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा, कर्मा और बस्तर की जनजातीय नृत्यों को यूट्यूब व सोशल मीडिया से वैश्विक बनाने का मंत्र।
- राजपरिवार का अद्वितीय दान: राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती द्वारा राजमहल दान कर संगीत विवि की स्थापना के इतिहास को किया गया नमन।
- कला से रोजगार और आजीविका: संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और चित्रकला को मानसिक शांति के साथ-साथ व्यावसायिक उद्यमिता से जोड़ने पर जोर।
- सांसद संतोष पांडे और कुलपति डॉ. लवली शर्मा का संबोधन: राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह की रही गरिमामय उपस्थिति।
Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya: 70 वर्षों की गौरवशाली यात्रा और सांस्कृतिक वैभव
सन 1956 में स्थापित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय ने आज अपने 70 वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह विश्वविद्यालय शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत, भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, लोकनृत्य, चित्रकला और मूर्तिकला के क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा अकादमिक स्तंभ है।
Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya के 70वें स्थापना दिवस पर राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि संगीत मनुष्य को आंतरिक और मानसिक शांति प्रदान करता है, जबकि नृत्य, पेंटिंग और शिल्प किसी भी समाज के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं। उन्होंने कहा कि 70 वर्षों में इस संस्थान ने देश-विदेश को सैकड़ों विख्यात शास्त्रीय गायक, वादक और नर्तक दिए हैं। अब समय आ गया है कि इस विरासत को आधुनिक तकनीक से जोड़कर 21वीं सदी के युवाओं की पहली पसंद बनाया जाए।
पंडवानी, पंथी और कर्मा को डिजिटल क्रांति से जोड़ें: राज्यपाल रमेन डेका
राज्यपाल ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक विधाओं के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष बल देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ की माटी में सुर और ताल की अद्भुत संपदा है:
- वैश्विक मंच पर लोककला: तीजन बाई की पंडवानी, देवदास बंजारे का पंथी नृत्य, राउत नाचा, सुवा, करमा और बस्तर के आदिवासियों के गेड़ी व गौर नृत्य ऐसी विधाएं हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं।
- इंटरनेट और डिजिटल मीडिया का सदुपयोग: राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि वे इन लोक कलाओं के उच्च-गुणवत्ता वाले डिजिटल ऑडियो-वीडियो तैयार करें और यूट्यूब, स्पॉटीफाई और सोशल मीडिया के जरिए दुनिया भर के संगीत प्रेमियों तक पहुंचाएं।
- प्रतिभा के साथ धैर्य आवश्यक: उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि कला के क्षेत्र में तात्कालिक प्रसिद्धि के पीछे भागने के बजाय निरंतर रियाज (अभ्यास), अनुशासन और समर्पण को अपना मूल मंत्र बनाएं।
दानवीर राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती के ऐतिहासिक त्याग को नमन
स्थापना दिवस के अवसर पर राजनांदगांव सांसद संतोष पांडे ने खैरागढ़ राजपरिवार के ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित किया।
सांसद श्री पांडे ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में लोग एक इंच जमीन दान करने में संकोच करते हैं, लेकिन खैरागढ़ के तत्कालीन नरेश राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती देवी ने अपनी दिवंगत पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह के संगीत प्रेम को अमर करने के लिए अपना भव्य ‘कमल विलास पैलेस’ और पूरी संपत्ति मां सरस्वती के चरणों में समर्पित कर दी। इस दूरदर्शी सोच ने खैरागढ़ जैसे छोटे से कस्बे को वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर राजधानी के समान प्रतिष्ठा दिलाई। उन्होंने युवाओं से राष्ट्रभक्ति और कला-कौशल को अपनी जीवनशैली बनाने का आह्वान किया।
कला को आजीविका और स्वरोजगार से जोड़ने का आह्वान
राज्यपाल श्री डेका ने कहा कि आधुनिक युग में कला केवल शौक या मनोरंजन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे आजीविका (Livelihood) और सशक्त व्यवसाय का रूप दिया जाना चाहिए।
उन्होंने विश्वविद्यालय प्रबंधन को सुझाव दिया कि वे कला प्रबंधन (Arts Management), साउंड इंजीनियरिंग, डिजिटल एनिमेशन और संगीत थेरेपी जैसे नए रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों पर ध्यान दें ताकि यहाँ से निकलने वाले कलाकार आत्मनिर्भर बन सकें और अपनी कला के दम पर देश-विदेश में सफल उद्यमी बन सकें।
राजपरिवार और विश्वविद्यालय परिवार की गरिमामय सहभागिता
समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और कुलगीत से हुआ। विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. लवली शर्मा ने स्वागत उद्बोधन देते हुए 70 वर्षों की उपलब्धियों और भावी योजनाओं का ब्योरा प्रस्तुत किया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर खैरागढ़ राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह, सांसद प्रतिनिधि भागवत शरण सिंह, प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े, जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, जनप्रतिनिधि, प्रख्यात संगीत साधक, प्राध्यापक और देश भर से आए छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
“खैरागढ़ केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का मंदिर है। राजा-रानी का त्याग और 70 वर्षों की यह साधना तभी पूरी तरह सार्थक होगी जब हमारी पंडवानी, पंथी और कर्मा की गूंज डिजिटल माध्यमों से न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो तक सुनाई देगी। कला साधकों को अपनी प्रतिभा के साथ आधुनिक तकनीक को अपनाना होगा और कला को स्वावलंबन का साधन बनाना होगा।”— रमेन डेका, राज्यपाल एवं कुलाधिपति, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की लोककलाओं, छात्रों और सांस्कृतिक विरासत के लिए इसके क्या मायने हैं?
- पारंपरिक कलाकारों को डिजिटल मंच: ग्रामीण लोक कलाकारों को विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ मिलकर अपनी प्रस्तुतियां यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मोनेटाइज करने की प्रेरणा मिलेगी।
- खैरागढ़ का सांस्कृतिक पुनरुत्थान: 70वें वर्ष में प्रवेश के साथ विश्वविद्यालय में नए इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरराष्ट्रीय स्कॉलरशिप और आधुनिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो के विस्तार की राह खुलेगी।
- वैश्विक पहचान: बस्तर और सरगुजा के लोक वाद्ययंत्रों और नृत्यों का दस्तावेजीकरण होने से अंतरराष्ट्रीय शोधार्थियों का खैरागढ़ की ओर आकर्षण बढ़ेगा।
खैरागढ़ संगीत विवि 70वां स्थापना दिवस: एक नजर में
- संस्थान का नाम: इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya)
- स्थापना वर्ष: 1956 (70वां स्थापना दिवस – 14 अक्टूबर 2026)
- मुख्य अतिथि: राज्यपाल एवं कुलाधिपति श्री रमेन डेका
- विशिष्ट अतिथि: सांसद श्री संतोष पांडे एवं राजकुमारी शताक्षी सिंह
- स्वागतकर्ता: कुलपति डॉ. लवली शर्मा एवं प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े
- संस्थापक: दानवीर राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह एवं रानी पद्मावती (पुत्री राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में)
- प्रमुख लोककलाएं रेखांकित: पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा, कर्मा एवं बस्तर जनजातीय नृत्य
- मुख्य संदेश: डिजिटल मीडिया द्वारा लोककला का वैश्विक प्रसार एवं कला से आजीविका निर्माण
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Khairagarh Sangeet Vishwavidyalaya का कौन-सा स्थापना दिवस मनाया गया?
14 अक्टूबर 2026 को इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का 70वां स्थापना दिवस समारोह राज्यपाल रमेन डेका के मुख्य आतिथ्य में मनाया गया।
राज्यपाल रमेन डेका ने लोककलाओं को लेकर क्या मुख्य संदेश दिया?
राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककलाओं जैसे पंडवानी, पंथी, कर्मा और बस्तर की नृत्य विधाओं को मोबाइल और इंटरनेट जैसे डिजिटल माध्यमों से दुनिया भर में पहुंचाया जाना चाहिए।
खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना का क्या ऐतिहासिक महत्व है?
इसकी स्थापना सन 1956 में खैरागढ़ के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती द्वारा अपनी दिवंगत पुत्री राजकुमारी इंदिरा के संगीत प्रेम को अमर बनाने के लिए अपना पूरा राजमहल दान करके की गई थी।
स्थापना दिवस समारोह में कौन-कौन से प्रमुख गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए?
समारोह में राज्यपाल रमेन डेका, सांसद संतोष पांडे, कुलपति डॉ. लवली शर्मा, राजपरिवार से राजकुमारी शताक्षी सिंह और प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े उपस्थित रहे।
आधिकारिक स्रोत: राजभवन सचिवालय, छत्तीसगढ़ / इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ / जनसंपर्क विभाग (DPR Raipur)