रायपुर, 07 अक्टूबर: छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रारूप को तैयार करने की कवायद के बीच राजधानी रायपुर में महिला संगठनों ने कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर अपनी बेबाक राय रखी है। Uniform Civil Code Chhattisgarh (समान नागरिक संहिता छत्तीसगढ़) समिति के समक्ष छत्तीसगढ़ महिला मंच और महाराष्ट्र मंडल महिला समिति की पदाधिकारियों ने विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर कड़े प्रावधानों की वकालत की। बैठक में महिलाओं ने विशेष रूप से लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीयन और पैतृक संपत्ति में बेटियों को पुरुषों के बराबर अधिकार देने की पुरजोर मांग की। यूसीसी समिति के सदस्य पूर्व आईएएस अधिकारी एम.के. राऊत और वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार ने इन सभी व्यावहारिक सुझावों को मसौदे में शामिल करने का भरोसा दिया।
मुख्य बिंदु:
- ‘Uniform Civil Code Chhattisgarh’: यूसीसी समिति के समक्ष महिला संगठनों ने विवाह, तलाक और उत्तराधिकार पर रखीं कानूनी मांगें।
- लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीयन: शोषण रोकने और लिव-इन से जन्मे बच्चों को पैतृक पहचान व अधिकार देने की मांग।
- पैतृक संपत्ति में बराबरी: धर्म आधारित कानूनों को खत्म कर पैतृक व निजी संपत्ति में महिला-पुरुष को समान हक देने पर जोर।
- आदिवासी संस्कृति का संरक्षण: 32% जनजातीय आबादी वाले राज्य में रूढ़िजन्य परंपराओं और रीति-रिवाजों को सहेजने पर बनी सहमति।
लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीयन: ‘बच्चों को मिले पहचान और भरण-पोषण’
परामर्श बैठक में सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री श्वेता पड्डा और अधिवक्ता श्रीमती सुचित्रा वर्धन ने लिव-इन रिलेशनशिप के कानूनी पहलुओं पर कड़े नियम बनाने की मांग उठाई।
महिलाओं ने तर्क दिया कि कानून के अभाव में लिव-इन में रहने वाली महिलाओं का भावनात्मक और आर्थिक शोषण होता है। इसलिए उत्तराखंड यूसीसी की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी लिव-इन का पंजीयन (Registration) अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों की जैविक पहचान (Biological Identity) सुनिश्चित की जाए और उन्हें पिता की संपत्ति में पूर्ण उत्तराधिकार और भरण-पोषण का कानूनी संरक्षण मिले। अधिवक्ता सुचित्रा वर्धन ने स्पष्ट किया कि केवल आपसी ‘एग्रीमेंट’ के आधार पर साथ रहना कानूनी मान्यता नहीं है, इसलिए संहिता में स्पष्ट प्रावधान जरूरी हैं।
पैतृक संपत्ति में बेटा-बेटी को समान हक और एक समान भरण-पोषण कानून
शताब्दी पाण्डेय ने धर्म आधारित अलग-अलग पर्सनल लॉज को समाप्त करने की वकालत करते हुए कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को पैतृक और व्यक्तिगत संपत्ति में पुरुषों के बराबर हक मिलना चाहिए।
बैठक में मांग की गई कि तलाक के बाद महिलाओं को मिलने वाले गुजारा भत्ते (भरण-पोषण) के नियम धर्म के आधार पर अलग नहीं होने चाहिए, बल्कि सभी के लिए एक समान और सख्त होने चाहिए। इसके साथ ही, आपसी सहमति से होने वाले तलाक (Mutual Consent Divorce) की जटिल कानूनी प्रक्रिया को सरल बनाने का सुझाव दिया गया, ताकि महिलाएं अदालतों के वर्षों लंबे चक्कर काटने से बच सकें।
आदिवासी समाज की परंपराओं का संरक्षण और पंचायतों में लीगल डेस्क
छत्तीसगढ़ एक जनजातीय बहुल (लगभग 32% आदिवासी आबादी) राज्य है। इसे ध्यान में रखते हुए बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि आदिवासी समाज की सदियों पुरानी विवाह परंपराओं, रीति-रिवाजों और रूढ़िजन्य अधिकारों पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही निर्णय लिया जाए, ताकि उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता प्रभावित न हो।
इसके अतिरिक्त, ग्रामीण और सुदूर वनांचल की महिलाओं तक कानूनी मदद पहुंचाने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में विशेष ‘कानूनी सहायता डेस्क’ (Legal Aid Desk) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। अधिवक्ता हेमलता सिंह और गीता श्याम दलाल ने कहा कि ‘एक राष्ट्र, एक कानून’ का उद्देश्य भेदभाव मिटाना है, लेकिन इसके लिए अंतिम पंक्ति की ग्रामीण महिलाओं का जागरूक होना सबसे पहली शर्त है।
“महिला संगठनों द्वारा दिए गए सुझाव केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन की वास्तविक कानूनी परेशानियों पर आधारित हैं। लिव-इन रिलेशनशिप से जन्मे बच्चों के अधिकार, भरण-पोषण की एकरूपता और पैतृक संपत्ति में समानता जैसे विषय बेहद गंभीर हैं। समिति इन सभी व्यावहारिक और प्रगतिशील सुझावों को छत्तीसगढ़ यूसीसी के आगामी मसौदे में पूरी संवेदनशीलता के साथ शामिल करेगी।”— एम.के. राऊत (सेवानिवृत्त IAS) एवं मोहन पवार (वरिष्ठ अधिवक्ता), सदस्य, UCC समिति छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की महिलाओं और समाज के लिए इन सुझावों के क्या मायने हैं?
- महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता: पैतृक संपत्ति में कानूनी हक मिलने से बेटियों को पारिवारिक संपत्ति में उनका वास्तविक अधिकार मिलेगा और आर्थिक असुरक्षा खत्म होगी।
- लिव-इन में सुरक्षा का कवच: अनिवार्य पंजीयन से महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों और धोखेबाजी पर रोक लगेगी तथा नवजात बच्चों के अधिकारों की रक्षा होगी।
- सुलभ न्याय व्यवस्था: पंचायतों में लीगल डेस्क बनने से गरीब और ग्रामीण महिलाओं को वकीलों के महंगे खर्च और अदालती झंझटों से राहत मिलेगी।
छत्तीसगढ़ यूसीसी परामर्श बैठक: एक नजर में
- विषय: Uniform Civil Code Chhattisgarh (समान नागरिक संहिता परामर्श)
- आयोजन स्थल: रायपुर, छत्तीसगढ़
- यूसीसी समिति सदस्य: एम.के. राऊत (सेवानिवृत्त IAS) एवं मोहन पवार (वरिष्ठ अधिवक्ता)
- सहभागी संगठन: छत्तीसगढ़ महिला मंच एवं महाराष्ट्र मंडल महिला समिति
- प्रमुख मांग 1: लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन व बच्चों को उत्तराधिकार
- प्रमुख मांग 2: पैतृक संपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अनिवार्य हिस्सा
- प्रमुख मांग 3: ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए कानूनी सहायता डेस्क
- विशेष सहमति: जनजातीय परंपराओं और संस्कृति के संरक्षण पर विस्तृत विमर्श
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
छत्तीसगढ़ यूसीसी समिति के सामने महिलाओं ने लिव-इन रिलेशनशिप पर क्या मांग रखी?
महिलाओं ने महिलाओं के शोषण पर रोक लगाने के लिए लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीयन और इससे जन्मे बच्चों को पिता की संपत्ति में पूर्ण उत्तराधिकार और जैविक पहचान देने की मांग की।
पैतृक संपत्ति को लेकर क्या सुझाव दिए गए हैं?
धर्म आधारित कानूनों को समाप्त कर पैतृक और व्यक्तिगत संपत्ति में बेटा और बेटी दोनों को 100% समान अधिकार देने और भरण-पोषण के नियम एक समान बनाने की मांग की गई।
आदिवासी समाज और उनकी परंपराओं पर बैठक में क्या चर्चा हुई?
छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल स्वरूप को देखते हुए समिति ने सहमति जताई कि आदिवासी समुदायों की रूढ़िजन्य परंपराओं, नीतियों और संस्कृति को ध्यान में रखकर ही कोई नियम तय किया जाएगा।
बैठक में यूसीसी समिति की ओर से कौन शामिल था?
बैठक में समान नागरिक संहिता समिति के सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्री एम.के. राऊत और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मोहन पवार शामिल थे।
स्रोत (Source): समान नागरिक संहिता समिति / जनसंपर्क विभाग, रायपुर (छत्तीसगढ़ शासन)