रायपुर, 21 सितंबर 2026: समाज की वास्तविक सेवा केवल किसी जरूरतमंद की तात्कालिक सहायता करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के समग्र स्वास्थ्य और खुशहाली के प्रति अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझना भी सेवा का ही एक उत्कृष्ट रूप है। पूरे प्रदेश में संचालित हो रहे ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत जनस्वास्थ्य को मजबूती देने के लिए राज्य पोषण सलाहकार सुश्री यामिनी तिवारी ने एक विशेष आलेख के माध्यम से Poshan Sankalp Chhattisgarh की अपील की है। उन्होंने परिवारों से आग्रह किया है कि बच्चों द्वारा जंक फूड पर किए जाने वाले अनावश्यक खर्च को नियंत्रित कर उसी राशि से बच्चों की थाली को पौष्टिक और विविधतापूर्ण बनाया जाए।
आधिकारिक विश्लेषण के अनुसार, वर्तमान समय में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड चिप्स, डिब्बाबंद नमकीन, क्रीम बिस्कुट, चॉकलेट और मीठे कार्बोनेटेड पेय बच्चों की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनते जा रहे हैं। देखने में प्रतिदिन का 20 से 30 रुपये का खर्च मामूली लग सकता है, लेकिन यदि इसका मासिक गणित देखा जाए तो यह राशि महीने में 600 से 900 रुपये तक पहुँच जाती है। पोषण सलाहकार ने स्पष्ट किया कि सवाल केवल यह नहीं है कि हम बच्चों पर कितना पैसा खर्च कर रहे हैं, बल्कि गंभीर सवाल यह है कि उस खर्च के बदले बच्चे के शरीर और मस्तिष्क को कितना वास्तविक पोषण मिल रहा है।
Poshan Sankalp Chhattisgarh के तहत सुश्री तिवारी ने ‘पैकेट से प्लेट की ओर’ (Packet to Plate) का व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत किया है। उन्होंने समझाया कि बच्चों की आदतें एक दिन में बलपूर्वक नहीं बदली जा सकतीं। बच्चों को केवल “चिप्स मत खाओ” कहकर डांटने के स्थान पर सकारात्मक संवाद स्थापित करना चाहिए कि “चलो, इतने ही पैसे में कुछ ऐसा लेते हैं, जो स्वादिष्ट भी हो और तुम्हें ताकत भी दे।” उसी 20-30 रुपये में भुना चना, मूंगफली, केला, मौसमी फल, अंकुरित अनाज, पोहा, उपमा अथवा छाछ जैसे स्थानीय व पौष्टिक विकल्प सहजता से उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
| जंक फूड बनाम पोषण की थाली: मुख्य तथ्य (Quick Facts) | विवरण |
|---|---|
| पहल का नाम | Poshan Sankalp Chhattisgarh (‘सेवा संकल्प से पोषण संकल्प तक’) |
| आलेख रचनाकार | सुश्री यामिनी तिवारी (राज्य पोषण सलाहकार, छत्तीसगढ़ शासन) |
| जंक फूड पर मासिक खर्च | ₹20-30 प्रतिदिन = ₹600 से ₹900 प्रतिमाह प्रति बच्चा |
| प्रस्तावित व्यावहारिक मॉडल | ‘पैकेट’ से ‘प्लेट’ की ओर (Packet to Plate Shift) |
| किफायती पोषक स्रोत | चना, मूंगफली, दालें, सोयाबीन, रागी, मोटे अनाज, मौसमी फल, दूध, अंडा |
| व्यवहार परिवर्तन सूत्र | “एक पैकेट कम और एक पौष्टिक विकल्प अधिक” |
‘पैकेट’ से ‘प्लेट’ की ओर: स्वास्थ्यप्रद स्थानीय विकल्पों की सूची
राज्य पोषण सलाहकार ने स्पष्ट किया कि Poshan Sankalp Chhattisgarh किसी भी खाद्य पदार्थ को पूरी तरह ‘बुरा’ घोषित करने के लिए नहीं है, बल्कि बच्चों के आहार में स्थानीय, ताजे और विविध पोषक तत्वों की हिस्सेदारी बढ़ाने का प्रयास है:
- चिप्स का विकल्प: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड चिप्स के स्थान पर बच्चों को भुना हुआ चना और मूंगफली दी जाए।
- पैकेटबंद नमकीन का विकल्प: बाजार की प्रिजर्वेटिव युक्त नमकीन के बदले घर का बना पोहा या चिवड़ा दिया जा सकता है।
- क्रीम बिस्कुट का विकल्प: अत्यधिक मैदा और शर्करा युक्त बिस्कुट की जगह केला और भीगा/भुना चना परोसा जाए।
- मीठे कार्बोनेटेड पेय का विकल्प: कृत्रिम फ्लेवर वाले मीठे पेय पदार्थों के स्थान पर ताजा दूध या घर की छाछ (मट्ठा) दी जाए।
- इंस्टेंट नूडल्स का विकल्प: मैदे से बने नूडल्स के बदले ताजी हरी सब्जियों और मूंगफली से युक्त पोहा या सूजी का उपमा तैयार किया जाए।
पोषण की शुरुआत घर से: महंगे नहीं, स्थानीय पोषक तत्वों की जरूरत
आलेख में पोषण संबंधी आम भ्रांति को दूर करते हुए बताया गया है कि अच्छा पोषण हमेशा महंगे डिब्बाबंद सप्लीमेंट्स से नहीं आता:
- सस्ते और सुलभ सुपरफूड्स: चना, मूंगफली, दालें, सोयाबीन, रागी तथा अन्य मोटे अनाज (मिलेट्स), स्थानीय हरी पत्तेदार सब्जियां, मौसमी फल, दूध, दही और अंडा जैसे खाद्य पदार्थ बहुत कम खर्च में भोजन को संपूर्ण और संतुलित बनाते हैं।
- छोटे घरेलू प्रयास: सुबह के नाश्ते में पोहा में सब्जियां और मूंगफली मिलाना, अंकुरित चना या मूंग को शामिल करना तथा मौसम के अनुसार बाजार में मिलने वाले सस्ते स्थानीय फल देना बच्चों के पोषण स्तर में क्रांतिकारी सुधार ला सकता है।
हर घर से उठे पोषण का संकल्प: सेवा का पारिवारिक स्वरूप
सुश्री यामिनी तिवारी ने रेखांकित किया कि ‘सेवा संकल्प अभियान’ को जनभागीदारी का स्वरूप देने में परिवार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है:
“बच्चे की थाली में एक फल जोड़ना, घर के बने ताजे नाश्ते को प्राथमिकता देना और जंक फूड पर होने वाले अनुपयोगी खर्च को रोकना—ये समाज सेवा के मूक लेकिन अत्यंत प्रभावशाली रूप हैं। आइए, संकल्प लें कि हम जंक फूड पर अनावश्यक खर्च बंद करेंगे और स्थानीय पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता देंगे। क्योंकि ‘एक पैकेट कम और एक पौष्टिक विकल्प अधिक’ हमारे बच्चों के स्वस्थ और सशक्त भविष्य की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।”
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CGPSC/UPSC Static Facts: कुपोषण का ट्रिपल बर्डन, NFHS-5 एवं राज्य की पोषण योजनाएं
प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC GS-2 लोक स्वास्थ्य/पोषण तथा CGPSC Paper-6 सामाजिक परिदृश्य व महिला-बाल कल्याण) के लिए मानक तथ्य:
- कुपोषण का ‘ट्रिपल बर्डन’ (Triple Burden of Malnutrition):
- अवधारणा: एक ही समाज या परिवार में तीन प्रकार की पोषण संबंधी समस्याओं का एक साथ सह-अस्तित्व:
- अल्पपोषण (Undernutrition – बौनापन एवं सूखा रोग)।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी (Micronutrient Deficiency – एनीमिया/छिपी भूख)।
- अतिपोषण (Overnutrition – मोटापा एवं गैर-संचारी रोग), जो उच्च वसा, शर्करा और नमक (HFSS) वाले जंक फूड के अत्यधिक सेवन से बच्चों में फैल रहा है।
- अवधारणा: एक ही समाज या परिवार में तीन प्रकार की पोषण संबंधी समस्याओं का एक साथ सह-अस्तित्व:
- छत्तीसगढ़ में पोषण सांख्यिकी (NFHS-5 आधिकारिक आंकड़े – 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे):
- ठिगनापन / बौनापन (Stunting): 34.6% (उम्र के अनुसार कम लंबाई – दीर्घकालिक कुपोषण का सूचक)।
- सूखा रोग (Wasting): 18.9% (लंबाई के अनुसार कम वजन – तीव्र कुपोषण का सूचक)।
- कम वजन (Underweight): 31.3%।
- एनीमिया (6 से 59 माह के बच्चे): 67.2% बच्चे रक्ताल्पता (आयरन की कमी) से ग्रसित हैं।
- मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान (छत्तीसगढ़):
- प्रारंभ: 2 अक्टूबर 2019 को महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर प्रारंभ।
- लक्ष्य: 0 से 5 वर्ष के बच्चों को कुपोषण मुक्त तथा 15 से 49 वर्ष की महिलाओं को एनीमिया मुक्त बनाना। इसमें गरम पौष्टिक भोजन, अतिरिक्त पोषण के रूप में अंडा, मूंगफली-गुड़ की चिक्की और रागी के पौष्टिक व्यंजन प्रदान किए जाते हैं।
- राष्ट्रीय पोषण मिशन (POSHAN Abhiyaan):
- 8 मार्च 2018 को झुंझुनू (राजस्थान) से प्रारंभ। प्रतिवर्ष सितंबर माह को देश भर में ‘राष्ट्रीय पोषण माह’ (National Nutrition Month) के रूप में मनाया जाता है।
विश्लेषण: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड जंक फूड की आर्थिक लागत और व्यवहार परिवर्तन संचार (BCC)
(UPSC/CGPSC Mains Analysis – Public Health, Behavioral Economics & Child Development)
1. छिपी हुई आर्थिक लागत और ‘खाली कैलोरी’ (Empty Calories) का संकट: ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवारों में भी पैकेज्ड जंक फूड पर प्रतिमाह ₹600 से ₹900 का खर्च यह सिद्ध करता है कि कुपोषण का कारण हमेशा ‘धन का अभाव’ नहीं होता, बल्कि अक्सर ‘जागरूकता का अभाव’ होता है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ बच्चों के पेट को केवल रिफाइंड मैदा, पाम ऑयल और चीनी से भर देते हैं, जिनमें सूक्ष्म पोषक तत्व (आयरन, जिंक, विटामिन, प्रोटीन) शून्य होते हैं। यह बच्चों में समय से पहले डायबिटीज, एकाग्रता की कमी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट लाता है, जिससे परिवारों पर भविष्य का चिकित्सा व्यय (Out-of-Pocket Expenditure) बढ़ जाता है।
2. व्यवहार परिवर्तन संचार (Behavior Change Communication – BCC) और ‘नज थ्योरी’: नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रिचर्ड थैलर की ‘नज थ्योरी’ (Nudge Theory) के अनुसार, केवल निषेध या डांटने से लोगों की आदतें नहीं बदलतीं। Poshan Sankalp Chhattisgarh में सुझाया गया संवाद—“चलो इतने ही पैसे में स्वाद और ताकत दोनों लेते हैं”—एक सकारात्मक मनोवैज्ञानिक नज (Nudge) है। जब चिप्स के समानांतर भुना चना या पोहा पेश किया जाता है, तो यह बच्चे के निर्णय को बिना किसी जबरदस्ती के स्वस्थ दिशा में मोड़ देता है। पोषण सुरक्षा को हासिल करने के लिए यह कम लागत वाला व्यवहार परिवर्तन सबसे टिकाऊ साधन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. Poshan Sankalp Chhattisgarh के अनुसार बच्चे जंक फूड पर औसतन कितना खर्च कर रहे हैं?
राज्य पोषण सलाहकार के अनुसार बच्चे चिप्स, नमकीन, बिस्कुट और मीठे पेय पर प्रतिदिन ₹20 से ₹30 खर्च कर रहे हैं, जो महीने में ₹600 से ₹900 तक का भारी अनुपयोगी खर्च बन जाता है।
Q2. ‘पैकेट से प्लेट की ओर’ मॉडल के तहत जंक फूड के क्या प्रमुख स्वस्थ विकल्प सुझाए गए हैं?
चिप्स के बदले भुना चना-मूंगफली, पैकेट नमकीन के बदले घर का पोहा-चिवड़ा, क्रीम बिस्कुट के बदले केला-चना, मीठे पेय के बदले छाछ-दूध और नूडल्स के बदले सब्जी युक्त उपमा-पोहा सुझाया गया है।
Q3. इस विशेष पोषण आलेख की रचनाकार कौन हैं?
यह मार्गदर्शक आलेख छत्तीसगढ़ शासन की राज्य पोषण सलाहकार सुश्री यामिनी तिवारी द्वारा ‘सेवा संकल्प अभियान’ के अंतर्गत लिखा गया है।
स्रोत (Source)
सुश्री यामिनी तिवारी, राज्य पोषण सलाहकार, छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग (DPR Chhattisgarh) आधिकारिक विशेष लेख, 21 सितंबर 2026.