Lokrang Parv CG: सरहुल और करमा की थाप पर झूम उठा रायपुर, लोकसंस्कृति के सतरंगी रंगों के साथ हुआ भव्य समापन

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रायपुर, 8 सितंबर 2026: जब सरगुजा और जशपुर के जंगलों की गूंजती धुनें राजधानी रायपुर के मंच पर उतरीं, तो हर दर्शक अपनी जड़ों से जुड़ता महसूस करने लगा। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले तीन दिवसीय Lokrang Parv CG (‘लोकरंग पर्व’) का मंगलवार को बेहद भव्य और भावपूर्ण समापन हुआ। कार्यक्रम का अंतिम दिन पूरी तरह से सरगुजा-जशपुर अंचल की मनमोहक आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा।

इस महोत्सव के इतिहास में पहली बार जशपुर अंचल के पारंपरिक ‘सरहुल’ और ‘करमा’ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों की मधुरता और कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने ऑडिटोरियम के पूरे वातावरण को उत्साह और उमंग से भर दिया। ऐसा लग रहा था मानो छत्तीसगढ़ का पूरा सुदूर अंचल सिमटकर रायपुर के इस मंच पर आ गया हो।

संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने इस अवसर पर कहा कि ऐसे आयोजन केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि यह हमारी युवा पीढ़ी को उनकी सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं। उन्होंने जोर दिया कि लोककलाओं को मंच देना हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।

लोकरंग पर्व समापन: मुख्य तथ्य (Quick Facts)विवरण
कार्यक्रम का नामLokrang Parv CG (तीन दिवसीय)
मुख्य आकर्षण (पहली बार)सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति
प्रमुख लोकनृत्यसरहुल, करमा, पंथी और नाचा-गम्मत
आयोजक विभागसंस्कृति एवं पुरातत्व विभाग (संचालक: डॉ. संजय कन्नौजे)
कार्यक्रम का संदेशविलुप्त होती लोकविधाओं का संरक्षण एवं संवर्धन

समापन दिवस के स्टार कलाकार और उनकी प्रस्तुतियां

तीन दिनों तक चले Lokrang Parv CG के अंतिम दिन विभिन्न अंचलों के कलाकारों ने अपनी ऊर्जा और कला से समां बांध दिया। मंच पर अपनी प्रस्तुति देने वाले प्रमुख कलाकार इस प्रकार रहे:

  • श्री विजय कुमार भगत (जशपुर): इनके दल द्वारा जशपुर अंचल के पारंपरिक ‘सरहुल’ एवं ‘करमा’ नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी गई।
  • डॉ. रामनारायण नेताम (रायपुर): इन्होंने छत्तीसगढ़ी आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी।
  • श्री नवलदास मानिकपुरी (दुर्ग): इन्होंने अपने सुरों के जादू से लोकगीत-संगीत का समां बांधा।
  • सुश्री आरती बारले (भिलाई): इन्होंने बाबा गुरु घासीदास के संदेशों पर आधारित ‘पंथी नृत्य’ (Panthi Dance) की अत्यधिक ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
  • सुश्री रमादत्त जोशी (रायपुर): इन्होंने ‘नाचा-गम्मत’ (Nacha-Gammat) की प्रस्तुति से हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया।

विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति

इस ऐतिहासिक Lokrang Parv CG के समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे के साथ कई साहित्यकार और कलाप्रेमी विशेष रूप से उपस्थित रहे। इनमें प्रमुख रूप से छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि श्री मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार श्री दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार श्री विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य श्रीमती प्रसन्ना अवस्थी तथा समाजसेवी श्री उदयभान चौहान मौजूद थे। दर्शकों ने भी कलाकारों की प्रस्तुतियों पर तालियों के साथ जमकर उत्साहवर्धन किया।


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UPSC/CGPSC Static Facts: सरहुल, करमा, पंथी और नाचा क्या है?

चूंकि Lokrang Parv CG पूरी तरह से छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं पर केंद्रित था, इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं (CGPSC Paper-6 / Prelims – Art & Culture) की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए इन नृत्यों की बुनियादी (Static) जानकारी होना बहुत जरूरी है:

  • सरहुल नृत्य (Sarhul Dance): यह मुख्य रूप से ‘उरांव’ (Oraon) जनजाति का सबसे प्रमुख पारंपरिक नृत्य और पर्व है। यह चैत्र मास में ‘साल वृक्ष’ (Sal tree) में फूल लगने के समय प्रकृति और धरती माता की पूजा के लिए किया जाता है।
  • करमा नृत्य (Karma Dance): यह बैगा, उरांव, मुंडा और गोंड जनजातियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है। यह ‘करम वृक्ष’ (कर्म) की पूजा और नई फसल के आगमन का प्रतीक है।
  • पंथी नृत्य (Panthi Dance): यह छत्तीसगढ़ के ‘सतनामी समुदाय’ का प्रमुख भक्ति नृत्य है। इसमें बाबा गुरु घासीदास जी के उपदेशों को तेजी से गाते हुए पिरामिड और कलाबाजियां (Acrobatics) दिखाई जाती हैं। स्व. देवदास बंजारे पंथी के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय कलाकार थे।
  • नाचा-गम्मत (Nacha-Gammat): नाचा छत्तीसगढ़ का सबसे लोकप्रिय लोक नाट्य (Folk Theatre) है। इसमें पुरुष ही महिलाओं के कपड़े पहनकर (पारी) अभिनय करते हैं और बीच-बीच में ‘गम्मत’ (प्रहसन/Comedy) के जरिए सामाजिक बुराइयों पर तीखा व्यंग्य (Satire) किया जाता है। (दाऊ मंदराजी को नाचा का भीष्म पितामह कहा जाता है)।

विश्लेषण: राजधानी में आदिवासी संस्कृति का प्रदर्शन क्यों जरूरी है?

(CGPSC Mains Analysis – Art, Culture & Tribal Integration)

1. मुख्यधारा से जुड़ाव (Tribal Integration): आमतौर पर बस्तर या सरगुजा की आदिवासी संस्कृति उन्हीं अंचलों तक सीमित रह जाती है। Lokrang Parv CG जैसे आयोजनों के माध्यम से जशपुर के ‘सरहुल’ को रायपुर (राजधानी) के मंच पर लाना, आदिवासी समाज को मुख्यधारा के साथ जोड़ने का एक बेहतरीन ‘सांस्कृतिक पुल’ (Cultural Bridge) है।

2. अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण (Intangible Cultural Heritage): वैश्वीकरण और डिजिटल मनोरंजन के दौर में नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट रही है। नाचा-गम्मत और पंथी जैसी कलाओं को संरक्षित करना केवल कलाकारों को रोजगार देना नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ को विलुप्त होने से बचाना है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1. Lokrang Parv CG के तीसरे दिन पहली बार किस अंचल की संस्कृति का प्रदर्शन किया गया?

लोकरंग पर्व के अंतिम दिन पहली बार सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिली, जिसमें जशपुर के ‘सरहुल’ एवं ‘करमा’ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी गई।

Q2. जशपुर दल का नेतृत्व कर ‘सरहुल और करमा’ की प्रस्तुति किसने दी?

कार्यक्रम में श्री विजय कुमार भगत (जशपुर) के दल द्वारा पारंपरिक वेशभूषा और लय के साथ सरहुल एवं करमा नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी गई।

Q3. सरहुल नृत्य किस जनजाति द्वारा और कब किया जाता है?

सरहुल नृत्य मुख्य रूप से ‘उरांव’ जनजाति द्वारा चैत्र मास (वसंत ऋतु) में ‘साल वृक्ष’ में फूल आने के दौरान प्रकृति की पूजा के रूप में किया जाता है।

स्रोत (Source)

छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग / जनसंपर्क विभाग (DPRCG), 08 सितंबर 2026, रायपुर।

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