रायपुर, 11 अक्टूबर: आपातकाल के विरुद्ध लोकतंत्र की रक्षा के लिए संपूर्ण क्रांति का शंखनाद करने वाले भारत रत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) की 125वीं पावन जयंती और महान समाजशिल्पी भारत रत्न नानाजी देशमुख की जयंती के अवसर पर राजधानी रायपुर के मोती बाग स्थित प्रेस क्लब सभागार में भव्य विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। Loknayak Jayaprakash Narayan Jayanti Raipur (लोकनायक जयप्रकाश नारायण जयंती रायपुर) के इस गरिमामय समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा ने जेपी के जीवन, 1975 के आपातकाल के दमन और आज के राजनीतिक परिदृश्य पर बेहद बेबाक और विश्लेषणात्मक विचार रखे। उन्होंने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का विरोध विशुद्ध राष्ट्रभक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए था, जबकि आज का तथाकथित विपक्ष सत्ता की भूख में भारत-विरोधी विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश को अस्थिर करने के षड्यंत्र में लिप्त है।
मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- ‘Loknayak Jayaprakash Narayan Jayanti Raipur’: लोकतंत्र सेनानी संघ और लोकतंत्र प्रहरी द्वारा जेपी की 125वीं जयंती व नानाजी देशमुख जयंती का संयुक्त आयोजन।
- नानाजी ने बचाई थी जेपी की जान: पटना के गांधी मैदान में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान नानाजी देशमुख ने अपने शरीर पर प्रहार झेलकर बचाए थे जेपी के प्राण।
- संघ पर जेपी का ऐतिहासिक वक्तव्य: 1975 में जेपी ने कहा था—’यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) फासीवादी है, तो जयप्रकाश नारायण भी फासीवादी है।’
- सप्त क्रांति बनाम मोदी सरकार: जेपी की सात क्रांतियों (सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक) को आज पीएम नरेंद्र मोदी की जनकल्याणकारी नीतियां कर रही हैं चरितार्थ।
- आपातकाल का बर्बर सच: 1 लाख से अधिक लोकतंत्र सेनानी जेलों में बंद रहे, 3000 से अधिक अखबारों पर लगा ताला, 350 पत्रकार भेजे गए थे सलाखों के पीछे।
- छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान: भूपेश सरकार द्वारा बंद की गई पेंशन को सीएम विष्णु देव साय ने कानून बनाकर बहाल किया; दिया राजकीय सम्मान।
जेपी और नानाजी देशमुख का अटूट संबंध: लाठीचार्ज में जेपी की रक्षा करते हुए नानाजी का हाथ हुआ था फ्रैक्चर
गोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता पंकज झा ने 11 अक्टूबर की तारीख के अद्भुत ऐतिहासिक संयोग को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती आती है, उसी तरह 11 अक्टूबर को देश की दो महान विभूतियों—लोकनायक जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख की जयंती एक साथ आती है।
उन्होंने इतिहास का एक अत्यंत भावुक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि आपातकाल के बाद जेपी हमारे बीच यदि दो वर्ष और जीवित रह सके, तो इसका पूरा श्रेय संघ प्रचारक नानाजी देशमुख को जाता है। 1974 के बिहार आंदोलन के दौरान जब पटना के गांधी मैदान में इंदिरा गांधी की पुलिस ने जेपी पर जानलेवा लाठीचार्ज किया, तब नानाजी देशमुख ने अपनी जान की परवाह किए बिना जेपी के ऊपर झुककर लाठियों के सारे वार अपने हाथों और सिर पर झेले थे। यह इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि जब भी किसी लोकतंत्र रक्षक पर संकट आएगा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक अपनी देह और प्राण देकर उसकी रक्षा करेगा। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जेपी को और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नानाजी देशमुख को भारत रत्न देकर इन दोनों विभूतियों को राष्ट्र का सर्वोच्च सम्मान दिया।
‘यदि RSS फासीवादी है, तो मैं भी फासीवादी हूँ’: जेपी का दो टूक जवाब
पंकज झा ने जेपी के बौद्धिक और वैचारिक सफर पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जेपी अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय से 1920 के दशक में समाजशास्त्र (Sociology) में एमए करके लौटे थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर भूमिगत हुए और आजादी की अलख जगाई।
आजादी के बाद वे सत्ता की मलाई खा सकते थे, उन्हें केंद्र में बड़े पदों और प्रधानमंत्री तक का प्रस्ताव था, लेकिन उन्होंने सत्ता को ठुकराकर विनोबा भावे के साथ भूदान और सर्वोदय आंदोलन चुना। उन्होंने कहा कि जब 1975 के आंदोलन में इंदिरा सरकार ने संघ को फासीवादी कहकर बदनाम करने की कोशिश की, तब जेपी ने मंच से ललकारते हुए कहा था कि “यदि संघ फासीवादी है, तो जयप्रकाश नारायण भी फासीवादी है।” जेपी स्वयंसेवक न होते हुए भी संघ के राष्ट्रभाव के सबसे बड़े संरक्षक बने।
जेपी की ‘सप्त क्रांति’ और मोदी सरकार का सुशासन: सात बदलावों की तुलना
पंकज झा ने स्पष्ट किया कि जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ केवल सरकार बदलने का राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि वह सात क्रांतियों (सप्त क्रांति) का दर्शन था—सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक/शैक्षणिक, आध्यात्मिक और नैतिक क्रांति:
- सामाजिक व नैतिक चेतना: लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘स्वच्छ भारत अभियान’ आज हर बच्चे के संस्कार का हिस्सा बन चुका है।
- आर्थिक व मानवीय बदलाव: देश के 25 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकालना और 3 करोड़ से अधिक गरीबों को पक्के आवास देना जेपी के सपनों का ही साकार रूप है।
- सांस्कृतिक व आध्यात्मिक नवजागरण: अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण, काशी-उज्जैन कॉरिडोर, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और भारतीय संस्कृति पर गर्व का भाव जेपी की सांस्कृतिक व राष्ट्रीय क्रांति का मूर्त रूप है।
- एकात्म मानववाद से जुड़ाव: जेपी की संपूर्ण क्रांति और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानववाद’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो व्यक्ति के शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समग्र विकास की बात करते हैं।
जेपी का देशभक्त विपक्ष बनाम आज की विदेशी साजिशें: पंकज झा का तीखा प्रहार
पंकज झा ने समकालीन राजनीति पर तीखा प्रहार करते हुए तत्कालीन विपक्ष और आज के विपक्ष के नैतिक पतन की तुलना की:
“लोकनायक जेपी, नानाजी, अटल जी और आडवाणी जी ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ देश का सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया, लेकिन उनकी लड़ाई भारत की सीमाओं के भीतर थी। उनकी देशभक्ति पर उनका घोर विरोधी भी कभी अंगुली नहीं उठा सका। इसके विपरीत, आज का विपक्ष सत्ता पाने के लिए देश को दांव पर लगा रहा है। वे विदेशों में जाकर भारत के लोकतंत्र को कोसते हैं, चुनाव आयोग और सीएजी (CAG) जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाते हैं
उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप जी की किताब का संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि 1977 में चुनाव हारने के बाद प्रताड़ना झेल चुके जेपी स्वयं इंदिरा गांधी से मिलने गए थे और स्नेह से पूछा था—‘इंदु, अब तुम प्रधानमंत्री नहीं हो, तुम्हारा घर खर्च कैसे चलेगा?’ यह था विरोधियों के प्रति जेपी का बड़प्पन और शुचिता। आज का विपक्ष घृणा और बैमनस्यता की राजनीति कर रहा है।
आपातकाल के काले अध्याय के गवाह: सच्चिदानंद उपासने और सुरेंद्र पाटनी के संस्मरण
कार्यक्रम के सूत्रधार एवं लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सच्चिदानंद उपासने ने आपातकाल के दौरान जेल में बिताए 19 से 21 महीनों की यातनाओं को याद किया। उन्होंने आपातकाल के दौर की वह प्रसिद्ध प्रेरक कविता सुनाई जिसने लाखों युवाओं को जेल जाने का हौसला दिया था:
“जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है,
तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार तक आई है!
आज चलेगा कौन देश से भ्रष्टाचार मिटाने को,
बर्बरता से लोहा लेने, सत्ता से टकराने को?”— सच्चिदानंद उपासने द्वारा उद्धृत जेपी आंदोलन की कालजयी कविता
वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सुरेंद्र पाटनी ने 1975 के काले दिनों को याद करते हुए बताया कि वे उस समय मात्र 15 वर्ष के बाल स्वयंसेवक थे। उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि कैसे सुबह टहलने निकले देशभक्तों को पुलिस जबरन उठाकर अज्ञात जेलों में ठूंस देती थी और परिजनों को महीनों तक पता नहीं चलता था। उन्होंने कहा कि जेपी ने चंबल के कुख्यात डाकुओं का आत्मसमर्पण कराकर उन्हें मुख्यधारा में जोड़ा था। जेपी का शाश्वत संदेश था—‘कुर्सी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह जनता से बड़ी नहीं हो सकती।’
छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान: साय सरकार का ऐतिहासिक कानून
गोष्ठी में वक्ताओं ने रेखांकित किया कि किस प्रकार पिछली कांग्रेस सरकार ने दुर्भावनापूर्वक छत्तीसगढ़ के लोकतंत्र सेनानियों की सम्मान निधि (मीसा पेंशन) बंद कर दी थी। लोकतंत्र सेनानियों ने 5 वर्षों तक सड़कों और अदालतों में कड़ा संघर्ष किया।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार बनते ही न केवल मीसा बंदियों की सम्मान निधि को बकाए सहित बहाल किया गया, बल्कि विधानसभा में बाकायदा ‘छत्तीसगढ़ लोकतंत्र सेनानी सम्मान अधिनियम’ पारित कर इसे कानूनी और स्थायी रूप दिया गया। साथ ही लोकतंत्र सेनानियों के निधन पर उन्हें पूरे राजकीय सम्मान (State Funeral Honors) के साथ विदाई देने का ऐतिहासिक प्रावधान किया गया है।
समारोह में प्रमुख विभूतियों का सम्मान एवं उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारंभ वंदे मातरम के समवेत गान और दीप प्रज्वलन से हुआ, जबकि समापन राष्ट्रगान से किया गया। गायक वसंत तारक ने प्रेरणादायी एकल गीत प्रस्तुत किया। मुख्य वक्ता पंकज झा को सुनील यादव, सत्या सरोज और प्रिया सिंह ने स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया, वहीं कार्यक्रम अध्यक्ष सुरेंद्र पाटनी को ज्योति जंघेल और चांदनी देवांगन ने स्मृति चिह्न प्रदान किया।
कार्यक्रम में लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रदेश महामंत्री असीत भट्टाचार्य, रायपुर जिला अध्यक्ष सुहास देशपांडे, लोकतंत्र प्रहरी के प्रदेश अध्यक्ष विशाल राजहंस, मातृशक्ति प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती सीमा शर्मा, आलोक श्रीवास्तव, नरेंद्र बालूराम शर्मा, कमल रंधावा, अर्चना बोरा, बरखा गुप्ता, गायत्री साहू, जशपुर से शिव प्रकाश तिवारी, ओम प्रकाश, खैरागढ़ से ज्योति जंघेल, सिमरगंडा से नरेंद्र शर्मा, सोनू जैन सहित बड़ी संख्या में मीसा बंदी परिवार और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे। आभार प्रदर्शन लोकतंत्र प्रहरी के प्रदेश अध्यक्ष विशाल राजहंस ने किया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण 125वीं जयंती संगोष्ठी: एक नजर में
- आयोजन: लोकनायक जयप्रकाश नारायण 125वीं जयंती एवं नानाजी देशमुख जयंती विचार गोष्ठी
- आयोजन स्थल: प्रेस क्लब सभागार, मोती बाग, रायपुर (छत्तीसगढ़)
- आयोजक: लोकतंत्र सेनानी संघ एवं लोकतंत्र प्रहरी, छत्तीसगढ़
- मुख्य वक्ता: श्री पंकज झा (वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया सलाहकार, मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन)
- समारोह अध्यक्ष: श्री सुरेंद्र पाटनी (वरिष्ठ समाजसेवी एवं भाजपा नेता)
- मार्गदर्शक/सूत्रधार: श्री सच्चिदानंद उपासने (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, लोकतंत्र सेनानी संघ)
- प्रमुख वक्तागण: श्री असीत भट्टाचार्य, श्री सुहास देशपांडे, श्री विशाल राजहंस, श्रीमती सीमा शर्मा
- मुख्य वैचारिक विमर्श: संपूर्ण क्रांति (सप्त क्रांति), आपातकाल 1975, जेपी-नानाजी संबंध, आज का विपक्ष बनाम देशभक्त विपक्ष
- राज्य सरकार की पहल: छत्तीसगढ़ लोकतंत्र सेनानी सम्मान अधिनियम (पेंशन बहाली व राजकीय सम्मान)