सुकमा/दंतेवाड़ा, 30 सितंबर: कभी बारूदी सुरंगों, मुठभेड़ों और बंदूकों के खौफ से पहचाने जाने वाले दक्षिण बस्तर में अब शांति, संवाद और विकास की एक नई सुबह दिखाई दे रही है। राजधानी दिल्ली से आए 43 प्रमुख सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के दल ने बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन सुकमा से जगरगुंडा और केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक 13 घंटे का ऐतिहासिक सफर तय किया। इस दल ने पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित नक्सलियों से बातचीत की, ताड़मेटला की ‘खूनी सड़क’ की दास्तान समझी, केरलापेंदा में 21 साल तक बंद रहे श्रीराम मंदिर में पूजा की और देर रात कुख्यात नक्सली कमांडर हिडमा के पैतृक गांव पूवर्ती पहुंचकर उसके परिवार से सीधा संवाद किया।
मुख्य बिंदु:
- दिल्ली के 43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा, जगरगुंडा, केरलापेंदा और पूवर्ती के सुदूर वनांचल में तय किया 13 घंटे का जमीनी सफर।
- माओवादी फरमान से 2003 से बंद पड़ा केरलापेंदा का श्रीराम मंदिर 21 साल बाद खुला; अब नियमित रूप से बज रही हैं घंटियां।
- 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा बना ‘माओवादी मुक्त गांव’; ग्रामीणों संग सीआरपीएफ ने दोबारा शुरू कराई पूजा।
- ताड़मेटला के 76 शहीदों की यादों से गुजरते हुए देर रात हिडमा के गांव पूवर्ती पहुंचा दल; बड़े भाई और परिजनों से की चर्चा।
सुकमा पुनर्वास केंद्र: हथियार छोड़कर जिंदगी संवार रहे पूर्व नक्सली
13 घंटे के इस सफर की शुरुआत सुकमा जिला मुख्यालय से हुई, जहां इंफ्लुएंसर्स ने सबसे पहले सुकमा पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने हिंसा और बारूद का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे पूर्व माओवादियों से आमने-सामने बातचीत की।
पूर्व नक्सलियों ने साझा किया कि किस तरह वे बहकावे में आकर जंगलों में भटकते रहे और अब आत्मसमर्पण के बाद शासन की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें सुरक्षित घर, कौशल प्रशिक्षण और सम्मानजनक शांतिपूर्ण जीवन मिला है। इसके बाद दल ने सुकमा पुलिस अधीक्षक (SP) से मुलाकात कर क्षेत्र में सुरक्षा ग्रिड और अंदरूनी गांवों तक पहुंचाई जा रही नागरिक सुविधाओं का ब्योरा जाना।
सुकमा में साइंस पार्क और ‘खूनी सड़क’ से ताड़मेटला तक का सफर
जंगलों और संघर्ष की छवि से उलट दल ने सुकमा में आधुनिक ‘साइंस पार्क’ का भ्रमण किया, जो आदिवासी बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक शिक्षा के विस्तार का प्रतीक बन चुका है।
तौंगपाल में दोपहर के भोजन के बाद दल जगरगुंडा की ओर बढ़ा। यह वही मार्ग है जिसे एक दौर में सुरक्षा बल और ग्रामीण ‘खूनी सड़क’ के नाम से जानते थे। जगरगुंडा पहुंचकर दल को उस ताड़मेटला क्षेत्र के इतिहास की जानकारी दी गई, जहां 6 अप्रैल 2010 को हुए भीषण नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 बहादुर जवानों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। शहीदों की स्मृति को नमन करते हुए इंफ्लुएंसर्स ने समझा कि इस इलाके ने शांति के लिए कितना बड़ा मूल्य चुकाया है।
यह भी पढ़ें: बस्तर ओलंपिक 2026: 1 अक्टूबर से शुरू होगा पंजीयन, 11 खेलों में दमखम दिखाएंगे युवा; जानिए तारीखें और नियम
केरलापेंदा का चमत्कार: 21 साल बाद गूंजी मंदिर की घंटियां, बना माओवादी मुक्त गांव
जगरगुंडा से आगे बढ़ते हुए इंफ्लुएंसर्स का दल केरलापेंदा गांव पहुंचा। यह गांव बस्तर में भय से मुक्ति का सबसे बड़ा आध्यात्मिक प्रतीक बन चुका है। यहां स्थित श्रीराम मंदिर में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की श्वेत संगमरमर की भव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं।
वर्ष 2003 में माओवादियों ने इस मंदिर में पूजा करने पर प्रतिबंध लगाते हुए ग्रामीणों को कड़े फरमान सुनाए थे, जिसके चलते लोग मंदिर जाने से भी डरते थे और 21 वर्षों तक इसके कपाट बंद रहे।
अप्रैल 2024 में सुरक्षा बलों की तैनाती और ग्रामीणों के साहस से इस मंदिर के ताले खुले। ग्रामीणों और सीआरपीएफ के जवानों ने मिलकर धूल साफ की और विधि-विधान से पूजा दोबारा शुरू हुई। वर्ष 2025 में इस गांव के 9 स्थानीय सहित कुल 16 माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद शासन ने केरलापेंदा को आधिकारिक रूप से ‘माओवादी मुक्त गांव’ घोषित किया।

हिडमा के पैतृक गांव पूवर्ती में देर रात दस्तक: परिजनों से आमने-सामने संवाद
केरलापेंदा से निकलकर घने जंगलों और दुर्गम रास्तों से गुजरते हुए दल देर रात पूवर्ती पहुंचा। पूवर्ती वही गांव है, जो कुख्यात नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक घर है और दशकों तक लाल आतंक की अघोषित राजधानी माना जाता था।
पूवर्ती में इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से उनके घर पर बैठकर आत्मीय संवाद किया। परिवार ने बताया कि गांव में अब सुरक्षा कैंप, पक्की सड़क, सोलर लाइट और राशन दुकान पहुंचने से हालात तेजी से बदल रहे हैं। गांव के लोग अब किसी संघर्ष में नहीं, बल्कि अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर एक सामान्य और सुरक्षित जिंदगी जीना चाहते हैं।
रात 11 बजे दंतेवाड़ा में सफर का समापन
पूवर्ती की संवेदनशील मुलाकात के बाद यह 13 घंटे का ऐतिहासिक सफर रात करीब 11 बजे मां दंतेश्वरी की पावन धरा दंतेवाड़ा पहुंचकर संपन्न हुआ।
इस यात्रा ने दिल्ली के कंटेंट क्रिएटर्स और विचारकों के सामने बस्तर की वह सच्चाई रखी, जिसे महानगरों के स्टूडियो में बैठकर नहीं समझा जा सकता—एक ओर बारूद का दर्दनाक अतीत, और दूसरी ओर सड़कों, स्कूलों, राशन और जलते दीयों से संवरता हुआ सुरक्षित वर्तमान।
“बस्तर को केवल दूर से नहीं, बल्कि उन पगडंडियों पर चलकर देखना जरूरी है जहां कभी भय का साया था। केरलापेंदा के मंदिर में जलता दीया और पूवर्ती के ग्रामीणों की आंखों में शांति की चाह यह बताती है कि बस्तर अब डर के साए से पूरी तरह बाहर निकलकर विकास और विश्वास की ओर कदम बढ़ा चुका है।”— बस्तर ग्राउंड विज़िट पर आए प्रतिनिधिमंडल का निष्कर्ष
बस्तर के आदिवासियों और देश के युवाओं के लिए इसके क्या मायने हैं?
- राष्ट्रीय विमर्श में बदलाव: सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के इस दौरे से देशभर के करोड़ों युवाओं तक बस्तर की नई और सकारात्मक तस्वीर पहुंचेगी, जिससे बस्तर को लेकर बना डर का पूर्वाग्रह टूटेगा।
- धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता: केरलापेंदा जैसे अंदरूनी गांवों में मंदिरों का दोबारा खुलना यह साबित करता है कि आदिवासी अंचलों में सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं फिर से निर्भीक होकर सांस ले रही हैं।
- मुख्यधारा से गहरा जुड़ाव: पूवर्ती तक प्रशासनिक पहुंच और ग्रामीणों का सीधा संवाद दर्शाता है कि सरकार की ‘नियद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाएं अंतिम छोर के गांव तक विश्वास बहाल कर रही हैं।
13 घंटे के सफर के 5 प्रमुख ऐतिहासिक पड़ाव
- सुकमा पुनर्वास केंद्र: हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटे पूर्व नक्सलियों से सीधा साक्षात्कार।
- सुकमा साइंस पार्क: आदिवासी अंचल में आधुनिक बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच का मॉडल।
- ताड़मेटला व जगरगुंडा मार्ग: 76 अमर शहीदों की स्मृति और कभी ‘खूनी सड़क’ रहे रास्ते पर सुरक्षित आवागमन।
- केरलापेंदा श्रीराम मंदिर: 2003 से बंद पड़ा मंदिर 21 साल बाद खुला; पूजा-अर्चना दोबारा शुरू, गांव माओवादी मुक्त।
- ग्राम पूवर्ती: नक्सली कमांडर हिडमा के पैतृक गांव में उसके भाई और परिजनों से शांति पर संवाद।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
केरलापेंदा का श्रीराम मंदिर कितने वर्षों तक बंद रहा और इसे कब खोला गया?
केरलापेंदा का श्रीराम मंदिर माओवादी दहशत के कारण वर्ष 2003 से 21 वर्षों तक बंद रहा, जिसे अप्रैल 2024 में ग्रामीणों और सुरक्षा बलों ने मिलकर पुनः खोला।
केरलापेंदा गांव को ‘माओवादी मुक्त गांव’ क्यों घोषित किया गया?
वर्ष 2025 में केरलापेंदा के 9 स्थानीय सहित कुल 16 सक्रिय माओवादियों ने हिंसा छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके बाद इस गांव को माओवादी मुक्त घोषित किया गया।
दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स के दल ने किन-किन संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा किया?
दल ने सुकमा पुनर्वास केंद्र, साइंस पार्क, जगरगुंडा (ताड़मेटला मार्ग), केरलापेंदा का राम मंदिर और हिडमा के पैतृक गांव पूवर्ती का 13 घंटे तक दौरा किया।
पूवर्ती में इंफ्लुएंसर्स ने किससे मुलाकात की?
पूवर्ती में इंफ्लुएंसर्स ने नक्सली कमांडर हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से मुलाकात कर गांव में आ रहे सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की।
स्रोत (Source): छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग (DPR Raipur / बस्तर संभाग ग्राउंड रिपोर्ट)