रायपुर, 23 सितम्बर 2026: ‘धान के कटोरे’ के रूप में विख्यात छत्तीसगढ़ में धान उपार्जन व्यवस्था को शत-प्रतिशत पारदर्शी, पुख्ता और बिचौलिया-मुक्त बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने अंतरिक्ष विज्ञान और भू-स्थानिक तकनीक (Geospatial Technology) का ऐतिहासिक उपयोग शुरू किया है। मंत्रालय महानदी भवन में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CCOST) के मध्य Chhattisgarh Digital Crop Survey और धान की खेती के सटीक एवं तकनीकी सत्यापन हेतु एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
इस तकनीकी गठबंधन का प्राथमिक उद्देश्य सैटेलाइट-आधारित मैपिंग (Satellite-based Mapping), डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक डेटा के बेहतर समन्वय से राज्य की धान खरीदी व्यवस्था को अत्यधिक सुदृढ़ बनाना है। इस परियोजना के तहत विशेष रूप से गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों—जैसे वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत पट्टा आबंटित भू-भागों और जलभराव वाले डुबान क्षेत्रों (Submerged/Catchment Areas) में स्थित कृषि भूमियों की विशेष पहचान की जाएगी। इसके बाद उनकी जीआईएस (GIS) आधारित डिजिटल पॉलीगॉन लेयर (Polygon Layer) तैयार की जाएगी, जो वर्तमान में राज्य के राजस्व नक्शों में डिजिटल रूप से मैप नहीं हैं।
तैयार की गई पॉलीगॉन लेयर और उच्च-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट डेटा के आधार पर आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 (KMY 2026-27) में धान की फसल के वास्तविक रकबे का सटीक और अचूक आकलन किया जाएगा। एमओयू निष्पादन के दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव श्री सोनमणि बोरा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव सुश्री रीना बाबा साहेब कंगाले, खाद्य विभाग की संचालक डॉ. फरिहा आलम तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CCOST) के संचालक श्री कवीश्वर उपस्थित रहे।
| धान तकनीकी सत्यापन एवं डिजिटल क्रॉप सर्वे MoU: मुख्य तथ्य (Quick Facts) | विवरण |
|---|---|
| समझौता ज्ञापन (MoU) | Chhattisgarh Digital Crop Survey (धान की खेती का सटीक सत्यापन) |
| हस्ताक्षरकर्ता संस्थाएं | खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय 🤝 छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CCOST) |
| हस्ताक्षर स्थल एवं तिथि | मंत्रालय महानदी भवन, नवा रायपुर (23 सितम्बर 2026) |
| लक्ष्य विपणन वर्ष | खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 (Kharif Marketing Year 2026-27) |
| प्रमुख प्रयुक्त तकनीकें | सैटेलाइट इमेजरी, जीआईएस पॉलीगॉन लेयर (GIS Polygon Layer) एवं भू-स्थानिक डेटा |
| विशेष लक्षित क्षेत्र | वन अधिकार पत्र (FRA) आबंटित भूमि एवं डुबान/तटीय कृषि क्षेत्र |
| सत्यापन प्रक्रिया | खसरों के अक्षांश-देशांतर (Lat-Long) का सैटेलाइट चित्रों से मिलान |
| उपस्थित शीर्ष नेतृत्व | श्री सोनमणि बोरा, सुश्री रीना कंगाले, डॉ. फरिहा आलम, श्री कवीश्वर |
गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों की मैपिंग: वन अधिकार और डुबान भूमियों की डिजिटल पहचान
Chhattisgarh Digital Crop Survey के तहत राज्य के उन भू-भागों को प्राथमिकता दी जा रही है जो दशकों से मुख्यधारा के डिजिटल भू-अभिलेखों से बाहर रहे हैं:
- एफआरए (FRA) पट्टा भूमियों का डिजिटलीकरण: अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम के तहत आदिवासी किसानों को आबंटित भूमि खंडों की भौतिक सीमाओं का जीआईएस सर्वेक्षण कर उनकी सटीक पॉलीगॉन लेयर तैयार होगी।
- डुबान क्षेत्रों की ट्रैकिंग: जलाशयों और नदियों के डूब क्षेत्रों में जलस्तर घटने पर होने वाली मौसमी धान की खेती को डिजिटल रूप से मैप किया जाएगा, ताकि वास्तविक उत्पादन का ही पंजीयन हो सके।
- मजबूत आधार ढांचा: इस पहल से दूरस्थ और अत्यंत दुर्गम वनांचलों की कृषि भूमि को एक स्थायी डिजिटल पहचान (Digital Cadastral Identity) मिलेगी।
सैटेलाइट इमेजरी से खसरों का मिलान: खरीफ 2026-27 के लिए फूलप्रूफ व्यवस्था
आगामी धान खरीदी सत्र में फर्जी पंजीयन और बोगस रकबे पर अंकुश लगाने के लिए दोहरी सत्यापन प्रणाली अपनाई जाएगी:
- अक्षांश-देशांतर (Latitude-Longitude) मिलान: राज्य के पूर्व से जियो-रेफरेंस्ड कृषि खसरों के भू-निर्देशांकों को भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रहों (ISRO / Remote Sensing) से प्राप्त ताजा सैटेलाइट इमेजरी से मिलाया जाएगा।
- धान की डिजिटल उपस्थिति की पुष्टि: सैटेलाइट के ‘स्पेक्ट्रल सिग्नेचर’ (Spectral Signatures) के माध्यम से यह प्रमाणित किया जाएगा कि पंजीकृत खसरे पर वास्तव में धान की फसल खड़ी है अथवा वह परती (Fallow) भूमि है।
- पारदर्शिता और सुदृढ़ता: इससे वास्तविक किसानों को उनकी वास्तविक उपज का पूरा समर्थन मूल्य प्राप्त होगा और बिचौलियों द्वारा दूसरे राज्यों के धान को खपाने या फर्जी रकबा दिखाकर अवैध लाभ लेने के रास्तों पर स्थायी रोक लगेगी।
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CGPSC Static Facts: CCOST, छत्तीसगढ़ धान उपार्जन प्रणाली एवं FRA
प्रतियोगी परीक्षाओं (CGPSC राज्य सेवा परीक्षा Paper-5 भारत एवं छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था तथा Paper-4 विज्ञान व तकनीक) के दृष्टिकोण से मानक तथ्य:
- छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CCOST – Chhattisgarh Council of Science & Technology):
- स्थिति: छत्तीसगढ़ शासन के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन शीर्ष स्वायत्त वैज्ञानिक निकाय (मुख्यालय: रायपुर)।
- कार्य: राज्य में सुदूर संवेदन उपयोग केंद्र (Chhattisgarh State Centre on Remote Sensing – RESAC), जीआईएस मैपिंग, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पेटेंट सूचना केंद्र का संचालन करना।
- छत्तीसगढ़ की विकेंद्रीकृत धान उपार्जन व्यवस्था (DCP Model):
- नोडल एजेंसी: छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित (मार्कफेड – MARKFED)।
- योजना: ‘कृषक उन्नति योजना’ के तहत राज्य सरकार किसानों से ₹3,100 प्रति क्विंटल (समर्थन मूल्य + इनपुट सब्सिडी) की दर से प्रति एकड़ अधिकतम 21 क्विंटल धान उपार्जित करती है।
- डिजिटल टूल्स: ‘टोकन तुंहर हाथ’ मोबाइल ऐप, बायोमेट्रिक आधार ऑथेंटिकेशन और डिजिटल गिरदावरी।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act – FRA):
- पारंपरिक वनवासियों और अनुसूचित जनजातियों को 13 दिसंबर 2005 से पूर्व अधिभोग वाली वन भूमि पर व्यक्तिगत (IFR) और सामुदायिक (CFR) वन अधिकार पत्र प्रदान किए जाते हैं। छत्तीसगढ़ देश में वन अधिकार पट्टे वितरित करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल है। इन पट्टाधारकों को भी समर्थन मूल्य पर धान बेचने की पात्रता है।
विश्लेषण: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी द्वारा ‘घोस्ट प्रोक्योरमेंट’ का खात्मा और आदिवासी समावेशन
(UPSC/CGPSC Mains Analysis – Agri-Tech Governance, Public Procurement & Tribal Welfare)
1. ‘घोस्ट प्रोक्योरमेंट’ (कागजी खरीदी) और अंतर-राज्यीय तस्करी पर तकनीकी प्रहार: छत्तीसगढ़ में धान उपार्जन के दौरान बिचौलियों द्वारा सीमावर्ती राज्यों (ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश) से सस्ता धान लाकर फर्जी या बंजर खसरों पर पंजीकृत कराकर ₹3,100 प्रति क्विंटल का अनुचित लाभ लेने की शिकायतें आती रही हैं। Chhattisgarh Digital Crop Survey के तहत सैटेलाइट इमेजरी और खसरों के अक्षांश-देशांतर का मिलान इस लीकेज को पूरी तरह समाप्त कर देगा। जब उपग्रह सीधे प्रमाणित करेगा कि खेत में धान की फसल लहलहा रही है या नहीं, तो बिना वास्तविक खेती के एक बोरी भी धान नहीं बेचा जा सकेगा। इससे राज्य के राजकोष की अरबों रुपये की बचत होगी।
2. गैर-सर्वेक्षित वनांचल का औपचारिक कृषि अर्थव्यवस्था में समावेशन: अब तक वन अधिकार पट्टा (FRA) धारक आदिवासी किसान और बांधों के डूब क्षेत्रों के काश्तकार डिजिटल गिरदावरी और सेटेलाइट रिकॉर्ड के अभाव में अक्सर प्रशासनिक जटिलताओं का सामना करते थे। CCOST द्वारा इनकी जीआईएस पॉलीगॉन लेयर बनाना न केवल उन्हें धान उपार्जन का पारदर्शी लाभ दिलाएगा, बल्कि भविष्य में उन्हें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और आपदा राहत जैसे वित्तीय लाभ भी पारदर्शी रूप से सुलभ कराएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. Chhattisgarh Digital Crop Survey हेतु किन दो संस्थाओं के मध्य समझौता हुआ है?
यह महत्वपूर्ण एमओयू खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय तथा छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (CCOST) के मध्य 23 सितम्बर 2026 को संपन्न हुआ।
Q2. इस तकनीकी एमओयू के तहत किन विशेष क्षेत्रों की जीआईएस पॉलीगॉन लेयर बनाई जाएगी?
वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आबंटित भू-भागों तथा जलाशयों/नदियों के डुबान क्षेत्रों की गैर-जियो-रेफरेंस्ड कृषि भूमियों की पहचान कर उनकी जीआईएस आधारित पॉलीगॉन लेयर बनाई जाएगी।
Q3. इस सैटेलाइट सत्यापन प्रणाली का उपयोग सर्वप्रथम किस विपणन वर्ष के लिए किया जाएगा?
इस भू-स्थानिक डेटा और सैटेलाइट इमेजरी प्रणाली का उपयोग आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 (KMY 2026-27) में धान के वास्तविक रकबे के सटीक आकलन हेतु किया जाएगा।
स्रोत (Source)
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग (DPR Chhattisgarh) आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति, 23 सितम्बर 2026.
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